लखनऊवासियों, हमारा शहर अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब, समृद्ध संस्कृति और प्रगतिशील सोच के लिए पहचाना जाता है। हमारे शहर की पहचान उसके लोगों से है, और उनमें सबसे प्रमुख भूमिका निभाते हैं हमारे युवा। यही कारण है कि जब भी राष्ट्रीय युवा दिवस की बात आती है, लखनऊ का वातावरण और भी जीवंत हो उठता है। हर वर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस पूरे देश में मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत के युवाओं की क्षमता कितनी अद्भुत है और स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्तित्व ने उनकी संभावनाओं को किस प्रकार पहचाना और दिशा दी। यह लेख राष्ट्रीय युवा दिवस के इतिहास, विवेकानंद के जीवन, उनके योग दर्शन और आज के युवाओं के लिए उनकी शिक्षाओं की प्रासंगिकता को समझाने का प्रयास है, और यह प्रयास लखनऊ के युवाओं के संदर्भ में और भी सार्थक हो जाता है क्योंकि यह शहर हमेशा से ही ऊर्जा, संस्कृति और विचार का केंद्र रहा है।
राष्ट्रीय युवा दिवस: इतिहास, उद्देश्य और आयोजन
भारत में हर वर्ष 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस पूरे उत्साह और प्रेरणा के साथ मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1984 में भारत सरकार द्वारा की गई थी, जब यह निर्णय लिया गया कि स्वामी विवेकानंद की जयंती को युवाओं के लिए एक राष्ट्रीय प्रेरणा दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस पहल के पीछे सरकार का स्पष्ट उद्देश्य था—देश के युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों, आदर्शों और जीवन-दर्शन से परिचित कराना, ताकि वे आत्मविश्वासी, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बन सकें। यह दिन युवाओं को यह याद दिलाता है कि राष्ट्र का भविष्य उनके हाथों में है और उनकी ऊर्जा, सोच और कार्यशैली ही देश की दिशा तय करती है।
राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर देशभर में विविध प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के केंद्रों में विशेष प्रार्थनाएँ, ध्यान सत्र, भजन, प्रवचन और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं, जो स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक और नैतिक विचारों को सामने लाते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में भाषण प्रतियोगिताएँ, निबंध लेखन, वाद-विवाद, पोस्टर मेकिंग, युवा रैलियाँ और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं, ताकि छात्र-छात्राएँ उनके विचारों से प्रेरणा ले सकें। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय युवा महोत्सव और युवा शिखर सम्मेलन जैसे बड़े आयोजन युवाओं को देश की विविध संस्कृतियों से जोड़ते हैं और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को मजबूत करते हैं। हर वर्ष तय की जाने वाली एक विशेष थीम युवाओं को समकालीन सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मुद्दों पर सोचने और राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है।
स्वामी विवेकानंद का जीवन, विचार और युवाओं पर प्रभाव
स्वामी विवेकानंद का जीवन आत्मसंघर्ष, ज्ञान की खोज और अदम्य आत्मविश्वास का प्रेरणादायक उदाहरण है। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही वे जिज्ञासु, तर्कशील और साहसी थे। जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और मानसिक संघर्ष आए, लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने सत्य और आत्मज्ञान की खोज नहीं छोड़ी। गुरु रामकृष्ण परमहंस के मार्गदर्शन में उन्हें जीवन का वास्तविक उद्देश्य मिला और उन्होंने आध्यात्मिकता को व्यवहारिक जीवन से जोड़कर देखा।
स्वामी विवेकानंद ने वेदांत और योग के विचारों को न केवल भारत में बल्कि पश्चिमी देशों तक पहुँचाया। 1893 में शिकागो में हुए विश्व धर्म संसद में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाला सिद्ध हुआ। वे युवाओं को देश की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे और मानते थे कि मजबूत चरित्र, आत्मविश्वास, अनुशासन और सेवा भावना से ही समाज और राष्ट्र का विकास संभव है।
उनके विचार आज भी युवाओं को न केवल व्यक्तिगत सफलता की ओर प्रेरित करते हैं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की सीख भी देते हैं। स्वामी विवेकानंद ने यह सिखाया कि सच्चा राष्ट्रनिर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक सेवा और मानवता के कल्याण से होता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मचिंतन, प्रेरणा और सकारात्मक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है।
योग में स्वामी विवेकानंद का योगदान
योग को विश्व पटल पर स्थापित करने में स्वामी विवेकानंद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने योग को किसी धार्मिक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सार्वभौमिक साधना के रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि योग मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा को एकजुट करता है और उसे अपने भीतर छिपी दिव्यता का अनुभव कराता है।उन्होंने चार मुख्य योगों अर्थात भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग और राज योग को सरल भाषा में समझाया। भक्ति योग मनुष्य को प्रेम और समर्पण की राह पर ले जाता है। ज्ञान योग सत्य, विवेक और अध्ययन पर आधारित है। कर्म योग निस्वार्थ कर्तव्य और सेवा के माध्यम से आत्मबोध का मार्ग दिखाता है। राज योग मन और इच्छाशक्ति के नियंत्रण द्वारा मनुष्य को उच्च चेतना की अवस्था में ले जाता है। विवेकानंद ने अमेरिका और यूरोप के देशों में योग के संदेश को फैलाया और उसके वैज्ञानिक स्वरूप को समझाया। उनकी पुस्तकों और व्याख्यानों ने योग को विश्वभर में नई पहचान दी। आज लखनऊ के पार्कों और संस्थानों में देखा जाने वाला योग अभ्यास उन्हीं शिक्षाओं की निरंतरता है। योग अब केवल साधना नहीं बल्कि जीवनशैली बन चुका है और इसका बड़ा श्रेय विवेकानंद की दृष्टि को जाता है।
कैसे विवेकानंद युवाओं को दिशा देते हैं
आज का युवा ऐसी दुनिया में जी रहा है जहाँ अवसर भी कई हैं और चुनौतियाँ भी उतनी ही तीव्र हैं। प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और तेजी से बदलती परिस्थितियाँ उसे अस्थिर कर सकती हैं। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद के विचार युवाओं को संतुलन, दिशा और आत्मविश्वास प्रदान करते हैं। वे युवाओं के विकास को चार खोजों से जोड़ते थे जो व्यक्ति को स्वयं और समाज दोनों के लिए उपयोगी बनाती हैं।
शारीरिक खोज
शारीरिक खोज के ज़रिए स्वामी विवेकानंद युवाओं को यह याद दिलाते थे कि एक मज़बूत शरीर ही मज़बूत मन की नींव होता है। उनका विश्वास था कि सपने देखने से ज़्यादा ज़रूरी है, उन्हें पूरा करने की शारीरिक और मानसिक क्षमता रखना। इसलिए वे युवाओं से अपने डर को पीछे छोड़ने, अपने भीतर छिपी शक्ति पर भरोसा करने और खुद को मज़बूत बनाने की बात कहते थे। विवेकानंद ऐसे युवाओं की कल्पना करते थे जो ऊर्जा, साहस और आत्मविश्वास से भरे हों, ताकि वे जीवन के हर लक्ष्य की ओर पूरे दमखम के साथ बढ़ सकें।
सामाजिक खोज
सामाजिक खोज के माध्यम से स्वामी विवेकानंद युवाओं को समाज की पीड़ा से जुड़ने और उसकी सेवा करने की प्रेरणा देते थे। उनका विश्वास था कि समाज सेवा केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के विकास का भी मार्ग है। वे मनुष्य की सेवा को ईश्वर की सच्ची आराधना मानते थे और चाहते थे कि युवा अपने देशवासियों के प्रति करुणा और जिम्मेदारी का भाव रखें। विवेकानंद की यह सीख कि वंचितों और कमजोरों की सेवा ही राष्ट्रनिर्माण की नींव है, आज भी हमें एक बेहतर और अधिक संवेदनशील समाज की दिशा दिखाती है।
बौद्धिक खोज
बौद्धिक खोज के ज़रिए स्वामी विवेकानंद युवाओं को सोचने, समझने और सीखने की गहरी दृष्टि देते थे। उनका विश्वास था कि तेज़ बुद्धि और जागरूक मन वाला युवा ही जीवन के सच्चे उद्देश्य तक पहुँच सकता है। वे शिक्षा को समाज को सशक्त बनाने का सबसे मज़बूत माध्यम मानते थे और चाहते थे कि ज्ञान केवल किताबों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज में बाँटा जाए। विवेकानंद के अनुसार शिक्षा का असली अर्थ जानकारी इकट्ठा करना नहीं, बल्कि ऐसे विचारों को अपनाना है जो जीवन को दिशा दें, चरित्र को गढ़ें और मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाएँ।
आध्यात्मिक खोज
आध्यात्मिक खोज को स्वामी विवेकानंद जीवन की सबसे ऊँची साधना मानते थे, जहाँ ध्यान और साधना के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर झाँकता है और स्वयं को समझता है। उनका विश्वास था कि युवाओं को आधुनिक दुनिया से सीखते हुए भी अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। आज जब भौतिक सफलता के बावजूद जीवन में खालीपन और मानसिक थकान महसूस होती है, तब आध्यात्मिक खोज उद्देश्य और शांति देती है। विवेकानंद युवाओं को किसी महान आदर्श के लिए जीने की प्रेरणा देते थे, क्योंकि उनके अनुसार जीवन क्षणिक है, लेकिन आत्मा शाश्वत है।
राष्ट्रीय निर्माण में युवाओं की भूमिका
स्वामी विवेकानंद ने इन चारों खोजों को युवाओं के लिए जीवन का लक्ष्य माना और उन्हें राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा। उनका विश्वास था कि जब युवा अपनी ऊर्जा और चेतना को सही दिशा में लगाते हैं, तो व्यक्ति के साथ-साथ पूरा देश जागरूक और सशक्त बनता है। वे ऐसे भारत का सपना देखते थे जहाँ गरिमा, स्वतंत्रता और समानता हो, और जहाँ सेवा, प्रेम और एकता समाज की नींव बनें। विवेकानंद के अनुसार एक मजबूत राष्ट्र वही है जहाँ हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिले और समाज एकजुट होकर आगे बढ़े।
संदर्भ -
https://tinyurl.com/mracs6jw
https://tinyurl.com/uhftzun2
https://tinyurl.com/ms9vphjp
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