लखनऊ, आज हम हॉकी खेल के इतिहास को समझेंगे, और देखेंगे कि, यह एक आधुनिक खेल के रूप में कैसे विकसित हुआ। फिर हम पता लगाएंगे कि, भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान हॉकी कैसे लोकप्रिय हुआ। इसके पश्चात, हम हॉकी के नियमों और खेल साहित्य पर नजर डालेंगे। बाद में, हम अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत की उपलब्धियों की जांच करेंगे। और अंततः, हम ध्यानचंद जी जैसे हॉकी के महान खिलाड़ियों और इस खेल के स्टेडियमों एवं प्रशिक्षण केंद्रों के बारे में जानेंगे।
फ़ील्ड हॉकी (Field hockey), 11-11 खिलाड़ियों के दो विरोधी संघों द्वारा खेला जाने वाला एक मैदानी खेल है। इसके खिलाड़ी, अपने विरोधी संघ के गोल (Goal) में एक छोटी गेंद को मारने के लिए, स्ट्राइकिंग छोर (Striking end) पर घुमावदार बनी छड़ियों का उपयोग करते हैं। माना जाता है कि, हॉकी की शुरुआत बहुत प्राचीन सभ्यताओं से हुई है। हॉकी में अरब, यूनानी, फारसी और रोमन लोगों के अपने-अपने संस्करण थे। साथ ही, दक्षिण अमेरिका के एज़्टेक इंडियन्स (Aztec Indians) द्वारा खेले जाने वाले, एक समान छड़ी खेल के प्रमाण भी पाए गए हैं। हॉकी को हर्लिंग (Hurling) और शिंटी (Shinty) जैसे अन्य शुरुआती खेलों से भी पहचाना जा सकता है। मध्य युग के दौरान, फ्रांस में हॉक्वेट (Hoquet) नामक एक छड़ी वाला खेल खेला जाता था। हॉकी का नाम इसी शब्द से आने की संभावना है।

उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजी स्कूलों में भी हॉकी प्रचलित हुआ। दक्षिणपूर्वी लंदन (London) के एक इलाके में स्थापित पहले पुरुष हॉकी क्लब ने, 1861 में एक नियम पुस्तक रिकॉर्ड की। लंदन के एक अन्य क्लब ने इन नियमों में कई प्रमुख बदलाव पेश किए। इनमें हाथों का उपयोग करने या कंधे के ऊपर लाठी उठाने पर प्रतिबंध; गेंद के रूप में रबर के स्थान पर एक गोले को अपनाना; और एक स्ट्राइकिंग सर्कल (Striking circle) को अपनाना शामिल था। ये नए नियम, 1886 में लंदन में स्थापित हुए हॉकी एसोसिएशन (Hockey Association) में लागू किए गए।
भारत और पूर्वी विश्व में इस खेल को फैलाने के लिए, ब्रिटिश सेना काफी हद तक जिम्मेदार थी। हॉकी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता 1895 में शुरू हुई, और 1928 तक यह भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया था। उस वर्ष ओलंपिक खेलों में भारतीय संघ ने पहली बार प्रतिस्पर्धा करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। बाद में, अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैचों के आह्वान के कारण, 1971 में हॉकी विश्व कप की शुरुआत हुई। इस खेल की अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एशियाई कप, एशियाई खेल, यूरोपीय कप और पैन-अमेरिकन खेल शामिल हैं।
खेल के मैदानों के रूप में, भूमि के बड़े भूखंडों की उपलब्धता और उपकरणों की सरल प्रकृति के कारण, हॉकी, धीरे-धीरे भारत में बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय खेल बन गया था। हमारे देश का पहला हॉकी क्लब, 1855 में तत्कालीन कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में बनाया गया था। अगले कुछ दशकों में, कलकत्ता में ‘बीटन कप’ और बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में ‘आगा खान टूर्नामेंट’ जैसी नई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं ने इस खेल को अधिक लोकप्रिय बनाया। 1907 और 1908 में भारत में हॉकी एसोसिएशन बनाने की बात चल रही थी, हालांकि, यह नहीं बन पाया। फिर बाद में, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) के गठन के बाद, 1925 में भारतीय हॉकी महासंघ (IHF) का गठन हुआ था।
भारतीय हॉकी महासंघ ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय दौरा, 1926 में न्यूजीलैंड (New Zealand) में आयोजित किया था। यहां भारतीय हॉकी पुरुष संघ ने 21 मैच खेले, और उनमें से 18 मैच जीते। इस प्रतियोगिता में युवा खिलाड़ी ध्यानचंद जी का उदय भी हुआ।

1924 तक ओलंपिक खेलों के साथ समझौता न होने पर हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। परंतु, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ ने हॉकी को एम्स्टर्डम 1928 (Amsterdam 1928) ओलंपिक से स्थायी दर्जा प्राप्त करवाया। भारतीय हॉकी महासंघ ने 1927 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ की सदस्यता अर्जित की। इस प्रकार, भारतीय हॉकी संघ ने 1928 में अपना पहला ओलंपिक खेल खेला।
दरअसल, हॉकी खेल का उद्देश्य, निर्धारित समय समाप्त होने से पहले विरोधी संघ से अधिक गोल करना है। सभी खिलाड़ी गेंद को नियंत्रित करने के लिए हॉकी स्टिक (Hockey stick) का उपयोग करते हैं, और अपने संघ के लिए स्कोर करने हेतु, इसे विरोधी गोल पोस्ट में डालते हैं। हॉकी स्टिक में घुमावदार छोर वाला एक लंबा हैंडल होता है, जो एक तरफ से सपाट होता है। स्टिक का वजन 737 ग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। पहले मैदानी हॉकी स्टिक लकड़ी के बनते थे, लेकिन आधुनिक हॉकी स्टिक कांच, कार्बन और अरैमिड (Aramid) के रेशों से बनाई जाती हैं।
खिलाड़ियों को गेंद को छूने के लिए, स्टिक के केवल सपाट हिस्से का उपयोग करने की अनुमति है। ऐसा न करने पर बैकस्टिक फाउल (Backstick foul) होता है, और तब गेंद विपक्षी को दे दी जाती है। खिलाड़ियों को केवल अपनी स्टिक से ही गेंद को पास या ड्रिबल (Dribble) करके विपरीत गोल की ओर ले जाना होता है। इसके अलावा, गोल शॉट केवल स्ट्राइकिंग सर्कल के अंदर से ही किया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं कि, आज 13 ओलंपिक पदकों ( 8 स्वर्ण, 1 रजत और 4 कांस्य पदक) के साथ, भारत ने खुद को हॉकी खेल की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया है। एक खिलाड़ी, जिन्होंने भारत की इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे 1980 के मॉस्को ओलंपिक खेलों (Moscow Olympics) के स्वर्ण पदक विजेता जफर इकबाल हैं। दिलचस्प बात यह है कि, पिछले 100 वर्षों में दुनिया के किसी भी अन्य हॉकी संघ ने ऐसी सफलता नहीं पाई है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, भारतीय हॉकी ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने 1947 से अब तक, 5 स्वर्ण पदक जीते हैं।
1976 में ओलंपिक खेलों में, हॉकी एस्ट्रोटर्फ (Astroturf) में बदल गई, जबकि भारतीय संघ को प्राकृतिक घास वाले मैदानों पर खेलने की आदत थी। हालांकि, 1980 में भारत ने इस नई सतह पर खेलने की सभी चुनौतियों को पार कर लिया, और मॉस्को में प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक जीता।
जफर इकबाल के अलावा, हॉकी के एक अन्य खिलाड़ी, जो काफ़ी मशहूर एवं प्रतिभाशाली है, मेजर ध्यानचंद है। ध्यानचंद वे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी छड़ी की खेल रणनीति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसी कारण, उन्हें ‘हॉकी के जादूगर’ यह उपनाम मिला। 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक सैनिक के घर जन्मे ध्यान सिंह, बहुत कम उम्र में ही हॉकी की ओर आकर्षित हो गए थे। अपने पिता की तरह वे भी 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए, और वहां अपना पसंदीदा खेल खेलना जारी रखा।
सैन्य में बिताए अपने समय के दौरान, उन्होंने 1922 और 1926 के बीच विभिन्न सेना हॉकी प्रतियोगिताओं और रेजिमेंटल खेलों को खेला। ध्यानचंद खेल में इतने तल्लीन रहते थे कि, वे अपनी ड्यूटी के बाद रात में भी हॉकी खेलते थे। चांदनी रात में खेलने के कारण ही, उन्हें ध्यानचंद नाम मिला, क्योंकि 'चंद' शब्द का हिंदी अर्थ ‘चंद्रमा’ है।
उनकी रैंकों में प्रगति के कारण, उन्हें 1926 में न्यूजीलैंड दौरे के लिए भारतीय सेना के संघ में शामिल किया गया। न्यूजीलैंड में भारतीय संघ ने 18 मैच जीते, दो मैच ड्रा (Draw) खेले और केवल एक ही मुकाबला हारा। भारत के इस अद्भुत प्रदर्शन की कई लोगों ने सराहना की, और विशेष रूप से ध्यानचंद जी को अपने पहले अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अपनी प्रतिभा के लिए बहुत प्रशंसा मिली। दौरे से वापसी पर, उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में लांस नायक नामित किया गया।
हॉकी को पहली बार ओलंपिक में शामिल करने के साथ, नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ, नीदरलैंड (Netherland) खेलों के लिए सर्वोत्तम संभव संघ भेजने के लिए उत्सुक था। पंजाब, बंगाल, राजपुताना, संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और मध्य प्रांत ने इन खेलों में भाग लिया। और जब भारतीय सेना ये खेल नहीं खेल पाई, तब ध्यानचंद जी को संयुक्त प्रांत अर्थात हमारे वर्तमान उत्तर प्रदेश के लिए खेलने दिया गया।

वास्तव में, ध्यानचंद जी के कार्यकाल से ही उत्तर प्रदेश में हॉकी खेल के लिए लोकप्रियता है। आज भी, हमारे राज्य में ऐसी कई पहले हैं, जिनसे इस खेल के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ पाए। उदाहरण के तौर पर, के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम, पहली बार 1957 में हमारे शहर लखनऊ के हलचल भरे हजरतगंज के ठीक मध्य में खोला गया था। इसका नाम महान हॉकी खिलाड़ी - बाबू के. डी. सिंह के नाम पर रखा गया है, जिनका जन्म लखनऊ में हुआ था। यह भारत के सबसे पुराने बहुउद्देशीय स्टेडियमों में से एक है। के. डी. सिंह बाबू स्टेडियम में क्रिकेट, टेनिस, फुटबॉल और हॉकी सहित कई अलग-अलग खेल खेले जाते हैं। इस स्थल ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मैचों की मेजबानी की है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/mc4sw5fh
2. https://tinyurl.com/3h9eed3j
3. https://tinyurl.com/5tvx36rw
4. https://tinyurl.com/yp34n4bw
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