हम सभी दशहरे की तैयारियों में जुटे हैं। यह उत्सव आपकी जिंदगी में खुशियाँ भर दे, यही हमारी कामना है। तो चलिए, आज दशहरे के अवसर पर हमारे शहर लखनऊ की ऐशबाग रामलीला और बक्शी का तालाब रामलीला पर चर्चा करते हैं।
लखनऊ में रामलीला का इतिहास पुराना, अनूठा और बेहद दिलचस्प रहा है। इसकी शुरुआत नवाब सआदत अली खान (1797-1814 ईस्वी) के शासनकाल में हुई थी और उन्होंने इसमें हिस्सा भी लिया था। लेकिन इसके मंचन के लिए स्थायी प्रयत्न नवाब नसीरुद्दीन हैदर (1827-1837 ईस्वी) ने किए थे। तब, पहला 'रामलीला मैदान' ऐशबाग में स्थापित किया गया था। तब से लेकर आज तक, हर साल बिना किसी रुकावट के इस स्थान पर रामलीला का मंचन किया जाता रहा है।

दूसरी ओर, लखनऊ के ग्रामीण इलाकों में, बक्शी का तालाब की रामलीला सबसे पुरानी मानी जाती है, जिसमें मुख्य किरदार मुसलमानों द्वारा निभाए जाते रहे हैं। ऐशबाग क्षेत्र नवाबों की दरियादिली, उदारता, खुलेपन और न्यायप्रियता का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने तीन प्रमुख समुदायों - हिंदुओं, सुन्नी मुसलमानों और शिया मुसलमानों को बड़ी मात्रा में जमीन दान दी थी। इन जगहों पर, आज वर्तमान रामलीला मैदान, ईदगाह और मलिका जहाँ की कर्बला स्थित हैं।
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल एवं अंतर-सामुदायिक रिश्ता, उन नवाबों के मध्यकालीन दौर से चला आ रहा है, जिन्होंने कला को संरक्षण दिया था। यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। कई जगहों पर, वार्षिक रामलीलाओं में मुसलमान मुख्य भूमिकाएँ निभाते हैं। वास्तव में, हमारे राज्य उत्तर प्रदेश के कई कस्बों और गाँवों में, रामलीला समितियों के प्रबंधन में शीर्ष पदों पर मुसलमान शामिल होते हैं। हमारे राज्य की इस प्रसिद्ध गंगा-जमुनी तहजीब की एक अनूठी झलक, निम्नलिखित जगहों पर मिलती है। यहाँ सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों के रंग आपस में घुल-मिल जाते हैं।
1. मुमताज नगर
नवरात्रि के दौरान, यहाँ हर साल मजीद अली नामक एक व्यक्ति चंदा इकट्ठा करना, कलाकारों के साथ तालमेल बिठाना और सभी व्यवस्थाएं संभालना आदि काम करते हैं। वे भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित मुमताज नगर में हर साल होने वाली रामलीला के मुख्य व्यवस्थापक हैं। मजीद अली 'रामलीला रामायण समिति' के अध्यक्ष हैं। उनके पूर्वजों ने आज से लगभग पचास साल पहले इस सिलसिले की शुरुआत की थी। इसके पीछे उनका उद्देश्य यह था कि चूंकि उनका गांव बहुसंख्यक रूप से मुस्लिम आबादी वाला है, फिर भी हिंदू त्योहारों पर उत्सव पूरे उल्लास के साथ मनाया जा सके।
अब इस आपसी सहयोग को एक स्थापित प्रथा का रूप मिल चुका है। हालाँकि राम, सीता और लक्ष्मण जैसी मुख्य भूमिकाएँ हिंदू कलाकार निभाते हैं, लेकिन स्थानीय मुसलमान भी खुशी-खुशी अन्य किरदार निभाते हैं। मजीद अली सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। इसलिए, वे मुख्य भूमिकाओं के लिए हिंदुओं का चयन करते हैं, क्योंकि लोग इन भूमिकाओं को निभाने वाले कलाकारों के पैर छूते हैं और उनकी आरती भी उतारते हैं।
इसके अलावा, रामलीला के आयोजन के लिए अधिकांश आर्थिक योगदान मुसलमानों की तरफ से आता है। चाहे वह प्रकाश व्यवस्था (लाइटिंग) हो, पोशाकें हों या फिर मंच प्रबंधन, यह समुदाय इस रंगमंच का एक अभिन्न अंग है। रामलीला के अलावा, गांव के अधिकांश त्योहार धार्मिक एकता के रंग में रंगे होते हैं। कृष्णजन्माष्टमी के दौरान कृष्णलीला होती है, जबकि दिवाली और होली का जश्न हमेशा एक साझा सामुदायिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। रमजान के दौरान रोजा इफ्तार भी इसी भाईचारे की अनूठी मिसाल पेश करते हैं।
2. बक्शी का तालाब रामलीला
बक्शी का तालाब क्षेत्र में, सलमान खान और अरबाज खान नामक दो सगे भाई, पिछले कई वर्षों से राम और लक्ष्मण की भूमिका निभा रहे हैं। अपनी व्यस्त पढ़ाई के बावजूद भी, उन्होंने रामलीला में इन मुख्य भूमिकाओं को निभाने का एक भी मौका नहीं गँवाया है। यहाँ सिर्फ राम और लक्ष्मण ही नहीं, बल्कि लंका के राजा रावण और सीता के पिता जनक जैसे नाटक के अन्य मुख्य किरदार भी मुसलमान कलाकारों द्वारा ही निभाए जाते हैं।
बक्शी का तालाब रामलीला में हिंदू-मुस्लिम का यह रिश्ता 1972 से चला आ रहा है। उसी साल इस आयोजन की शुरुआत हुई थी। उससे पहले, बक्शी का तालाब के लोग रामलीला देखने लगभग 10 किलोमीटर दूर इटौंजा जाया करते थे। यहाँ रामलीला शुरू करने का श्रेय उस क्षेत्र में तैनात डॉक्टर मुजफ्फर हुसैन और तत्कालीन ग्राम प्रधान मैकू लाल यादव को जाता है। तभी से हिंदू और मुसलमान मिलकर रामलीला के किरदारों की भूमिकाएं निभाते आ रहे हैं। आसपास या दूर-दूर तक हुआ कोई भी सांप्रदायिक तनाव कभी उनकी रामलीला की इस साझा परंपरा को प्रभावित नहीं कर पाया।
कई बार ऐसा भी समय आया है, जब रामलीला का आयोजन रमजान के महीने के साथ मेल खा गया। ऐसी स्थिति में इफ्तार के समय, प्रदर्शन को कुछ देर के लिए रोक दिया जाता है। रामलीला के पात्र निभाने वाले लोग नमाज अदा करते हैं और इफ्तार में शामिल होते हैं। उसके बाद प्रदर्शन दोबारा शुरू होता है।
3. ऐशबाग रामलीला
लखनऊ के सबसे बड़े और सबसे पुराने आयोजन के रूप में, ऐशबाग रामलीला मैदान नवाब आसिफ-उद्-दौला द्वारा दान किया गया था। वे भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने यहाँ 6.5 एकड़ जमीन दान की थी और हर साल इस कार्यक्रम के आयोजन में सरकारी सहायता देने का वादा किया था, जिसके दस्तावेजी प्रमाण आज भी आयोजन समिति के पास सुरक्षित मौजूद हैं। गौर करने वाली बात यह है कि जब नवाब आसिफ-उद्-दौला ने रामलीला के लिए जमीन दान की थी, तो उन्होंने सड़क के ठीक दूसरी ओर ईदगाह के लिए भी उतनी ही जमीन दान में दी थी। रामलीला मैदान और ईदगाह आमने-सामने स्थित हैं, जो एक साझा और मिश्रित संस्कृति का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
ऐशबाग रामलीला की शुरुआत के लिए अयोध्या से कुछ ऐसे विद्वानों और कलाकारों को लाया गया था, जो रामायण के प्रसंगों का मंचन करने में माहिर थे। उन्होंने रामलीला का सजीव प्रदर्शन किया, जिससे नवाब काफी आकर्षित हुए और उन्होंने इसमें गहरी रुचि लेते हुए इसे प्रोत्साहित किया। इसके पीछे मुख्य मंशा यह थी कि आम जनमानस और निरक्षर लोग भी रामचरितमानस ग्रंथ में रचित श्रीराम के आदर्शों और लीलाओं को आसानी से समझ सकें।

यूँ तो औपचारिक रूप से 'ऐशबाग रामलीला समिति' की स्थापना 1860 में हुई थी, लेकिन इसका इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है। अवध के तीसरे बादशाह गाजी उद्दीन या अली शाह ने शाही खजाने से रामलीला के संचालन के लिए आर्थिक मदद भेजी थी। गोस्वामी तुलसीदास की प्रेरणा से रामलीला की जो यात्रा शुरू हुई थी, उसे ऐतिहासिक और वास्तविक पहचान अवध के नवाब आसिफ-उद्-दौला ने दी।
1857 से 1859 के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति के दौरान, यह रामलीला कुछ समय के लिए बाधित रही थी, लेकिन 1860 में 'ऐशबाग रामलीला समिति' का औपचारिक गठन किया गया। तब से लेकर आज तक रामलीला का यह मंचन सुचारु रूप से संचालित हो रहा है। ऐशबाग रामलीला मैदान के इसी ऐतिहासिक स्थल पर गोस्वामी तुलसीदास ने 'विनय पत्रिका' की रचना की थी। उसी की स्मृति में 'तुलसी शोध संस्थान' की स्थापना की गई। वर्ष 2004 में इस संस्थान का भव्य भवन बनकर तैयार हुआ। दुनिया भर में प्रसिद्ध 100 रामायणों में से 82 का संकलन यहां किया जा चुका है। इसके अलावा यहां 'राम भवन' का निर्माण भी किया जा चुका है। बदलते समय के साथ रामलीला का स्वरूप भी निरंतर आधुनिक होता रहा है।
ऐशबाग में, 'श्री बाल रामलीला' भी आयोजित की जाती है। यह देश की आजादी के पहले से ही निरंतर आयोजित होती आ रही है। कहा जाता है कि 1945 में स्थापित इस रामलीला में, 1947 में मिली देश की आजादी का जश्न भी बड़े धूमधाम से मनाया गया था। तब के जो बाल कलाकार थे, वे अब भले ही बड़े हो चुके हैं, लेकिन वे आज भी आने वाली पीढ़ी को इसकी सीख देने और इस महान विरासत को आगे बढ़ाने में पूरी निष्ठा से लगे हुए हैं।
रामलीला में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अटूट एकता की अपील करते हुए, हमारे शहर के कई लोग कहते हैं कि "ईश्वर या भगवान ने इंसानों को हिंदू और मुसलमान के खाँचे में नहीं बाँटा है। हम सब एक हैं, सब भाई-भाई हैं। इन सबसे ऊपर, हम सब केवल और केवल इंसान हैं।"
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/5n9af4ae
2. https://tinyurl.com/596jyk3e
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