जानवरों के शोक में छिपे भाव: मेरठवासियों, क्या आपने भी कभी यह महसूस किया है?

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जानवरों के शोक में छिपे भाव: मेरठवासियों, क्या आपने भी कभी यह महसूस किया है?

मेरठवासियो, हमारा शहर जहाँ एक ओर अपनी खेलनगरी की पहचान, सैनिक परंपराओं की विरासत और जिंदादिली से भरपूर जीवनशैली के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर यहाँ के लोग भावनाओं और रिश्तों को भी उतनी ही गहराई से समझते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि सिर्फ हम इंसान ही नहीं, बल्कि अन्य जीव-जंतु भी बेहद भावुक होते हैं? वे भी अपने जीवनसाथी, बच्चे या साथी की मृत्यु पर दुख महसूस करते हैं, और कभी-कभी वह दुख उनके पूरे व्यवहार में झलकता है। यह कोई भावनात्मक कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा चुका एक सत्य है। जानवरों की आँखों की नमी, उनकी चुप्पी, उनके बदलते व्यवहार और साथी की खोज में की गई हलचलों में भी एक गहराई होती है, एक ऐसा मौन शोक, जो हम इंसानों को भी रिश्तों और संवेदनाओं की एक नई परिभाषा सिखा सकता है।
इस लेख में हम जानवरों के शोक प्रकट करने के व्यवहार को चार महत्वपूर्ण पहलुओं के माध्यम से समझने की कोशिश करेंगे। सबसे पहले, हम देखेंगे कि हाथी अपने मृत साथियों के लिए किस प्रकार की शोक-प्रक्रियाएं अपनाते हैं और उनका यह व्यवहार कितना संवेदनशील होता है। इसके बाद, हम जानेंगे कि जब जानवर किसी प्रिय को खोते हैं तो उनके व्यवहार में किस तरह के परिवर्तन आते हैं। तीसरे हिस्से में, हम कुछ ऐसे प्रमुख जानवरों के उदाहरणों पर नज़र डालेंगे जो इंसानों की तरह ही शोक व्यक्त करते हैं। अंत में, हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह जानने का प्रयास करेंगे कि जानवरों में शोक की भावना कितनी गहराई लिए होती है और इसे कैसे अध्ययन किया जाता है।

हाथियों द्वारा अपने मृत साथियों के लिए निभाई जाने वाली शोक-प्रक्रियाएं
हाथी, केवल अपने विशाल शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भावनात्मक संवेदनशीलता के लिए भी जाने जाते हैं। जब किसी झुंड का सदस्य मर जाता है, तो हाथी केवल उसे छोड़कर नहीं चले जाते। वे अक्सर कई घंटों, और कई बार तो दिनों तक, उस मृत हाथी के पास रहकर एक प्रकार की “अंतिम विदाई” अदा करते हैं। वे मृत शरीर को सूंड से धीरे-धीरे छूते हैं – जैसे कोई प्रियजन आखिरी बार अपने किसी अपने के चेहरे को सहला रहा हो। कुछ घटनाओं में यह भी देखा गया है कि हाथी मृत शरीर को मिट्टी, पत्तों या शाखाओं से ढकने का प्रयास करते हैं – यह व्यवहार एक प्रकार की “प्राकृतिक अंतिम क्रिया” जैसा प्रतीत होता है। यह केवल आदत नहीं, बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक क्रिया है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह जानवर भी जीवन और मृत्यु को हमारी ही तरह महसूस करते हैं? 
कई चिड़ियाघरों में एक ऐसी ही मार्मिक घटना सामने आई थी, जब हाथियों की एक जोड़ी में से एक का निधन हुआ। बचे हुए हाथी ने कई दिनों तक खाना कम कर दिया, और बार-बार उसी स्थान पर जाकर रुकता, जहाँ उसका साथी आखिरी बार देखा गया था। उसके व्यवहार में एक गहरी उदासी और चुप्पी देखने को मिली। इस तरह की घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि जानवरों के पास भी भावनाओं की एक पूरी दुनिया है – बस वे शब्दों में नहीं कह पाते।

शोकग्रस्त जानवरों के व्यवहार में आने वाले आम परिवर्तन
जब जानवर शोक में होते हैं, तो उनकी दिनचर्या में ऐसे परिवर्तन आते हैं जो इंसानों के दुःख से मिलते-जुलते हैं। जैसे हम अपनों को खोने के बाद गुमसुम हो जाते हैं, वैसे ही जानवर भी मौन, अलगाव और रुचि की कमी के संकेत देते हैं। वे खाना छोड़ देते हैं, थके-थके रहते हैं और पहले की तरह सामाजिक नहीं रहते। बंदरों में तो यह साफ देखा गया है – जब उनका कोई प्रिय मर जाता है, तो वे शव के पास घंटों या दिनों तक बैठे रहते हैं, और दुःख से भरे स्वर में रोते हैं। पालतू कुत्ते, जो अपने मालिक या साथी जानवर से बहुत गहरा भावनात्मक रिश्ता बना लेते हैं, उनके लिए इस तरह की हानि बहुत भारी होती है। वे अक्सर उस जगह पर लौटते हैं जहाँ उन्हें आखिरी बार देखा था, और घंटों दरवाजे की ओर देखते रहते हैं, जैसे कि कोई लौट आएगा। कई पशु प्रेमियों ने साझा किया है कि उनके कुत्तों ने परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद खाना छोड़ दिया, रोने जैसी आवाज़ें निकालना शुरू कर दीं, और कई हफ्तों तक सुस्त बने रहे। एक पशु प्रेमी ने बताया कि उनका बिल्ली का बच्चा, अपने साथी की मृत्यु के बाद हर दिन बालकनी (balcony) में जाकर एक ही कोने में घंटों बैठा रहता था। ये संकेत बताते हैं कि जानवर भी हमारे जैसी भावनाएं महसूस करते हैं, बस वे उन्हें जताने का तरीका अलग रखते हैं।

इंसानों की तरह शोक जताने वाले प्रमुख जानवरों के उदाहरण
भावनाएं सिर्फ इंसानों की विशेषता नहीं हैं। कई जानवर ऐसे हैं जो अपने मृत परिजनों, दोस्तों या बच्चों के लिए वही भावनाएँ दर्शाते हैं जो हम अपने प्रियजनों के लिए महसूस करते हैं। डॉल्फ़िन्स (Dolphins) का उदाहरण लें – जब उनका बच्चा मर जाता है, तो वे उसे पानी की सतह पर तैराकर अपने साथ घंटों या दिनों तक रखती हैं। वे न केवल शरीर से चिपकी रहती हैं, बल्कि कभी-कभी उसे ऊपर लाने की कोशिश करती हैं, मानो उसे फिर से सांस दिलाना चाहती हों। चिंपैंज़ी (Chimpanzee) अपने मरे हुए बच्चे को गोद में लिए रहते हैं, कभी-कभी जब तक वह गल न जाए। वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते। यह एक असहनीय दुःख है जिसे वे अपनी चुप्पी और अपने व्यवहार से प्रकट करते हैं। जिराफ़ों (Giraffe) में भी यह संवेदना देखी गई है – वे मृत शावक के पास खड़े रहते हैं, उसे सूंघते हैं, और गर्दन लपेटकर जैसे “गले लगाने” की कोशिश करते हैं। ऐसी ही एक घटना सामने आई, जहाँ एक गाय ने अपने मरे हुए बछड़े के पास तीन दिन तक बिना कुछ खाए-पिए समय बिताया। यह एक सजीव उदाहरण है कि भावनाएं केवल भाषा में नहीं होतीं – वे आचरण में, मौन में और आँखों में होती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानवरों में शोक की भावना की समझ
जब विज्ञान इस विषय की पड़ताल करता है, तो हमें पता चलता है कि जानवरों के दिमाग में भी वही तंत्र काम करता है जो इंसानों के दुख और भावनाओं को नियंत्रित करता है। “लिम्बिक सिस्टम” (limbic system) और “अमिगडाला” (amygdala) – जो हमारे भावनात्मक अनुभवों के केंद्र हैं – जानवरों में भी सक्रिय पाए गए हैं। यही कारण है कि हाथी, चिंपैंज़ी, भेड़िए और कई सामाजिक प्रजातियाँ दुःख, प्रेम और लगाव जैसे जटिल भावों को गहराई से अनुभव करती हैं। सामाजिक संरचना इन भावनाओं को और मज़बूत करती है। जो जानवर झुंड में रहते हैं, वे एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। उनके जीवन में सामाजिक संपर्क, देखभाल, और रिश्तों की भूमिका उतनी ही अहम होती है जितनी इंसानों में। इसलिए जब ऐसा कोई रिश्ता टूटता है, तो वे शोक व्यक्त करते हैं। मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पशु विज्ञान विभाग ने जानवरों में भावनात्मक व्यवहार पर कई प्रोजेक्ट्स (projects) शुरू किए हैं, जिनका उद्देश्य जानवरों को केवल “पालतू” या “जंगली” के रूप में नहीं, बल्कि “संवेदनशील प्राणी” के रूप में देखना है। यह शोध हमें इस बात की ओर ले जाता है कि हमें जानवरों के साथ हमारा व्यवहार मानवीय और करुणामय बनाना चाहिए।

संदर्भ-   

https://tinyurl.com/bd85z9fd 

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