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मेरठवासियों, भारत की धरती हमेशा से कला, संस्कृति और अध्यात्म की अनोखी संगति को आगे बढ़ाती रही है। हमारे शहर भले ही आज अपने ऐतिहासिक स्मारकों, क्रांतिकारी विरासत और शौर्य गाथाओं के लिए प्रसिद्ध हो, लेकिन यहां के लोगों में कला के प्रति संवेदनशीलता हमेशा से जीवित रही है - घर की दीवारों पर बने पारंपरिक अलंकरणों से लेकर स्कूलों में बच्चों द्वारा बनाई गई रंगीन कलाकृतियों तक। इसी संवेदनशीलता ने हमें भारतीय चित्रकला की उन गहरी जड़ों से जोड़ा है, जो हजारों वर्षों के विकास, अध्यात्म, समाज और संस्कृति की कहानी कहती हैं। भारतीय चित्रकला केवल चित्र बनाने की विधा नहीं, बल्कि जीवन, विश्वास, संघर्ष, उत्सव और मानवीय भावनाओं का दृश्य इतिहास है।
इस लेख में हम भारतीय चित्रकला की हजारों वर्षों में फैली यात्रा को सात सरल और महत्वपूर्ण पहलुओं के माध्यम से समझेंगे। इसमें इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से लेकर प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों की शुरुआत तक, और फिर अजंता-एलोरा जैसी शास्त्रीय कलाओं की रोशनी तक की कहानी शामिल है। साथ ही पट्टचित्र, सिगिरिया, बादामी, तंजौर और पल्लवकालीन दक्षिण भारतीय परंपराओं की विशिष्ट पहचान पर भी नज़र डालेंगे। अंत में, हम देखेंगे कि कैसे भारतीय कलाकारों ने अपने चित्रों में रोज़मर्रा की जिंदगी, भावनाओं, त्योहारों और समाज की धड़कन तक को मानवीय रूप में उकेरा है।
भारतीय चित्रकला की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक जड़ें
भारतीय चित्रकला की शुरुआत केवल सजावट के उद्देश्य से नहीं हुई; यह मनुष्य की आत्म-अभिव्यक्ति की प्राचीनतम विधाओं में से एक है। भारतीय परंपरा में कला को “साधना” माना गया है - एक ऐसा मार्ग, जिसके माध्यम से कलाकार अपने भीतर के संसार को बाहर प्रकट करता है। धार्मिक विश्वास, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, लोक-जीवन की सरलता और परिवार तथा समाज के बीच भावनात्मक संबंध, इन सबका प्रतिबिंब भारतीय चित्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कला यहाँ केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि एक “संवाद” है - मनुष्य और ब्रह्मांड के बीच। यही कारण है कि भारतीय चित्रकला में वस्तुओं को केवल वास्तविक रूप में नहीं दिखाया जाता, बल्कि उनमें आध्यात्मिक अर्थ छिपा होता है। समय-समय पर कला ने समाज की बदलती मानसिकता को भी दर्शाया - राजनीतिक स्थिरता के दौर में अध्यात्म और भक्ति के चित्र उभरे, जबकि सामाजिक परिवर्तन के समय मानव जीवन और संघर्ष ने चित्रों को नया आकार दिया। इस प्रकार भारतीय चित्रकला सदैव जीवंत, बहुआयामी और मानवीय रही है।
भारत में प्रागैतिहासिक और प्रारंभिक गुफा चित्रों की परंपरा
भीमबेटका, जोगीमारा और सीताबेंगा जैसी गुफाएँ भारतीय चित्रकला की 30,000 वर्ष पुरानी विरासत का प्रमाण हैं। इन गुफाओं में पाए गए चित्र दिखाते हैं कि प्रारंभिक मानव केवल जीवित रहने के लिए संघर्ष नहीं कर रहा था, बल्कि वह अपने अनुभवों, भावनाओं और परिवेश को चित्रों के माध्यम से समझने का प्रयास भी कर रहा था। इन चित्रों में शिकार के दृश्य, नृत्य-समूह, पशु-मानव संबंध और दैनिक जीवन के अनेक पहलू दर्शाए गए हैं। रंगों के लिए प्राकृतिक सामग्री - लाल गेरू, चारकोल (charcoal), हेमाटाइट (hematite) और पौधों के तत्वों - का उपयोग किया गया, जो बताता है कि उस समय भी लोग प्रकृति से गहरी जुड़ाव रखते थे। इन चित्रों में शैली सरल है, लेकिन उद्देश्य सीधा-समूह का जीवन, प्रकृति के नियम और उत्सवों को दिखाना। इन्हीं से भारतीय कला के प्रतीकवाद, कथा-वर्णन और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण की शुरुआत मानी जाती है।

अजंता, एलोरा और बाघ जैसी शास्त्रीय गुफा चित्रकलाओं का स्वर्ण युग
दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 9वीं शताब्दी तक के काल को भारतीय चित्रकला का “स्वर्ण युग” कहा जा सकता है। अजंता के भित्तिचित्रों में बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं और बौद्ध दर्शन का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण मिलता है - आँखों में करुणा, मुद्राओं में सौम्यता और रंगों में आध्यात्मिक गहराई। एलोरा में तीनों प्रमुख भारतीय परंपराएँ - बौद्ध, जैन और हिंदू - एक ही परिसर में मिलती हैं, जो धार्मिक सह-अस्तित्व का अद्भुत उदाहरण है। बाघ की गुफाएँ अपने जीवंत रंगों और प्रवाहमान रेखाओं के लिए जानी जाती हैं, मानो हर चरित्र अभी बोली उठेगा। इन स्थानों की तकनीकें, जैसे “फ्रेस्को-सीको” (Fresco-secco), ने भारतीय भित्तिचित्रों को वैश्विक पहचान दी। विषयों में धर्म के साथ-साथ सामाजिक जीवन, नृत्य, संगीत, वस्त्र, आभूषण और प्रकृति का विस्तृत चित्रण मिलता है - जो दर्शाता है कि कला केवल पूजा नहीं, बल्कि एक “संसार” है।

ओडिशा की पट्टचित्र और दक्षिण भारत की सिगिरिया व बादामी कला
पट्टचित्र ओडिशा की एक ऐसी पारंपरिक कला है, जिसमें कपड़े या ताड़पत्र पर अत्यंत बारीक रेखाओं और चमकीले रंगों से चित्र बनाए जाते हैं। इसका संबंध सीधे पूरी की रथयात्रा और श्रीजगन्नाथ परंपरा से है, जिससे यह चित्रकला आध्यात्मिक, अनुष्ठानिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बन जाती है। दूसरी ओर, श्रीलंका की सिगिरिया पेंटिंग्स दक्षिण भारतीय कला से गहरे जुड़ी हैं - इनमें सौंदर्य, प्रकृति और स्त्री-चित्रण की असाधारण कोमलता दिखाई देती है। बादामी और पल्लवकाल में बनी चित्रकलाएँ धार्मिक कथाओं के साथ राजनीतिक जीवन को भी व्यक्त करती हैं, जो उस समय के राज्य और समाज के संबंधों पर प्रकाश डालती हैं। इन शैलियों में रंग अधिक जीवंत, रेखाएँ अधिक गतिशील और भावनाएँ अधिक स्पष्ट रूप में उभरती हैं।

मध्ययुगीन दक्षिण भारत की चित्रकला: पनामालाई, सित्तनवासल और तंजौर परंपरा
पल्लवकालीन गुफा चित्रकला - विशेषकर सित्तनवासल और पनामालाई - जैन चिंतन, भक्ति, तप और प्रकृति के बीच मनुष्य की आध्यात्मिक खोज का चित्रण करती है। इन चित्रों की रंग-शैली शांत और सौम्य है, जिसमें प्रकृति के प्रतीक जैसे कमल, जल, मछलियाँ विशेष स्थान रखते हैं। तंजौर की चित्रकला इसके विपरीत भव्य, अलंकरणयुक्त और स्वर्णाभ चमक के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चित्र केवल दृश्य नहीं, बल्कि दैवीय उपस्थिति का अनुभव कराते हैं। तंजौर चित्रों में अनुपात, संरचना, वेशभूषा और चित्र-विधान अत्यंत परिष्कृत हैं, जो दर्शाता है कि मध्ययुगीन दक्षिण भारत में चित्रकला एक उच्च कोटि की शास्त्रीय विधा बन चुकी थी।
विजयनगर साम्राज्य की चित्रकला और मंदिर-आधारित कलात्मक विकास
विजयनगर काल का भारतीय कला पर गहरा प्रभाव है। हम्पी, लेपाक्षी और नल्लूर के मंदिरों में बनी चित्रकला भारतीय पुराणों को नए और गतिशील रूप में प्रस्तुत करती है। इन चित्रों में कहानी कहने का कौशल अद्वितीय है - चरित्र समूहों में व्यवस्थित, भावनाएँ तीव्र, और रंग संयोजन नाटकीय। सामाजिक जीवन के दृश्य - दरबार, नृत्य, संगीत, दैनंदिन कार्य - भी इन मंदिरों की दीवारों पर उकेरे गए हैं, जिससे यह कला “समाज का दृश्य अभिलेख” बन जाती है। यहाँ मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और साम्राज्य की प्रतिष्ठा के केंद्र थे।

भारतीय चित्रकला में दैनिक जीवन, रीति-रिवाज और सामाजिक भावनाओं का प्रतिबिंब
भारतीय चित्रकला की सबसे बड़ी शक्ति इसका मानवीय चरित्र है। चाहे वह बाघ गुफाओं की नर्तकियाँ हों, पट्टचित्र के देव-चित्र हों या विजयनगर की ग्रामीण झाँकियाँ - हर जगह मनुष्य, उसका परिवार, उसका श्रम, उसका उत्सव और उसकी भावनाएँ केंद्र में रहती हैं। किसान, कारीगर, महिलाएँ, बच्चे, पशु-पक्षी, त्योहार, विवाह, बाजार, गृहस्थी - ये सब भारतीय चित्रों में एक जीवंत संसार बनाते हैं। चित्रकला मानो कहती है - “मनुष्य की कहानी ही भारत की कहानी है।” यही कारण है कि भारतीय कला आज भी मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विविधता और सांस्कृतिक एकता का सबसे सुंदर प्रमाण है।
संदर्भ
https://rb.gy/o98j02
https://rb.gy/zo60mc
https://tinyurl.com/yearau8d
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