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हमारे शहर मेरठ में, रोशनी का पर्व दीपावली पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शाम होते ही शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक का संपूर्ण क्षेत्र, दीपों और झालरों की चमचमाती रोशनी से जगमगा उठता है। घरों, बाज़ारों, मंदिरों और गलियों में रंग-बिरंगी विद्युत मालाओं की सजावट से त्योहार की रौनक कई गुना बढ़ जाती है। लोग अपने घरों में लक्ष्मी-गणेश जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना करते हैं। जबकि मंदिरों में, दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। साथ ही, परिवार एक-दूसरे को पारंपरिक मिठाईयाँ बाँटकर दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। मेरठ के आबूलेन, घंटाघर, टीपी नगर, गढ़ रोड, शास्त्रीनगर, ब्रह्मपुरी, सदर बाजार और दिल्ली रोड जैसे प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों में, देर रात तक चहल-पहल बनी रहती है। विशेष रूप से आबूलेन और शारदा रोड पर दुकानों को किसी दुल्हन की तरह सजाया जाता है। रोशनी के इस पर्व का आनंद लेते हुए, लोग इस अवसर पर जमकर खरीदारी करते हैं।
रात ढलते ही आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाज़ी की छटा से दमक उठता है। बच्चें और युवा पटाखों तथा फुलझड़ियों के साथ उत्सव का भरपूर आनंद लेते हैं। साथ ही, स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे दीप प्रज्वलित कर, लोग अंधकार पर प्रकाश की विजय का पावन संदेश देते हैं। दीपावली की रात, मेरठ सचमुच ‘रोशनी के नगर’ में परिवर्तित हो जाता है, जहाँ का प्रत्येक घर और हर एक गली उल्लास व प्रकाश से नहायी हुई प्रतीत होती है। नगर एवं ग्रामीण क्षेत्र की जनता, इस त्योहार को शांतिपूर्वक तथा सौहार्दपूर्ण वातावरण में मनाती है।

यद्यपि संपूर्ण भारतवर्ष में दिवाली का मूल भाव और आध्यात्मिक सार एक समान ही रहता है, किंतु इसे मनाने की शैलियों और रीति-रिवाजों में क्षेत्रीय स्तर पर विविधता देखने को मिलती है। भारत की यह सांस्कृतिक संपन्नता केवल इसकी भाषाओं, पहनावे और परंपराओं में ही नहीं, बल्कि इस बात में भी परिलक्षित होती है कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लोग प्रकाश के इस पर्व को किस प्रकार मनाते हैं।
उत्तर भारत में दिवाली के त्योहार का शुभारंभ घरों और सार्वजनिक स्थानों की गहन सफाई तथा भव्य सजावट के साथ होता है। लोग अज्ञान व अंधकार पर ज्ञान एवं प्रकाश की विजय के प्रतीक रूप में अपने आवासों के चारों ओर मिट्टी के दीपक (दीये) प्रज्वलित करते हैं। लंकापति रावण का संहार करने के पश्चात, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन के पौराणिक प्रसंग को रंग-बिरंगी आतिशबाजी और विशाल एवं भव्य शोभायात्राओं के माध्यम से जीवंत किया जाता है। उपहारों एवं मिठाइयों का परस्पर आदान-प्रदान, उत्तर भारतीय उत्सव का एक अति महत्वपूर्ण अंग है, जहाँ लोग परिजनों और मित्रों के घर जाकर पर्व की खुशियाँ साझा करते हैं।

महाराष्ट्र और गुजरात सहित, भारत के पश्चिमी राज्यों में दिवाली एक विशिष्ट एवं भव्य रूप धारण करती है। यहाँ, यह पर्व अत्यंत उत्साह, उमंग और राजसी वैभव के साथ मनाया जाता है। धन एवं ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने हेतु श्रद्धालु विधि-विधान से ‘लक्ष्मी पूजन’ करते हैं। रंग-बिरंगे प्राकृतिक रंगों व चूर्ण से निर्मित ‘रंगोली’ की जीवंत कला परंपरा यहाँ इस उत्सव का अनिवार्य हिस्सा है। इसके अतिरिक्त, आतिशबाजी करना तथा चकली व शंकरपाले जैसे पारंपरिक स्वादिष्ट व्यंजनों का आस्वादन करना, इस क्षेत्र की अतिप्रिय परंपराओं में शामिल है।

दक्षिण भारत में दिवाली का पर्व अपनी अनूठी धार्मिक मान्यताओं और सात्विक परंपराओं के लिए जाना जाता है। तमिलनाडु में इस त्योहार को पूर्ण भक्ति, शुचिता और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु अपने घरों में दीपमालाएँ प्रज्वलित करते हैं तथा प्रथम पूज्य भगवान गणेश और धनदात्री देवी लक्ष्मी की आराधना करते हैं। दक्षिण भारतीय दीपावली की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक मुरुक्कू, अधिरसम और स्वादिष्ट लड्डुओं जैसे विविध प्रकार के नमकीन व मधुर व्यंजनों का निर्माण है। इसके साथ ही, लोग इस शुभ अवसर पर अपने आत्मीय जनों को वस्त्र एवं उपहार भेंट कर उनका स्नेह प्राप्त करते हैं।
पूर्वी भारत में दिवाली का मुख्य केंद्र बिंदु आद्याशक्ति देवी काली की उपासना है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में ‘काली पूजा’ का महापर्व दिवाली की तिथि के साथ ही संपन्न होता है। श्रद्धालु शक्ति और संरक्षण की अधिष्ठात्री देवी काली की दिव्य मूर्तियों की स्थापना कर तथा दीप प्रज्वलित कर उनका पूजन करते हैं। इस संध्या की मुख्य पहचान मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रमों और भव्य आतिशबाज़ी से होती है। यह स्वरूप देश के अन्य भागों से सर्वथा भिन्न है, जहाँ दिवाली मुख्य रूप से भगवान श्री राम के पुनरागमन अथवा लक्ष्मी पूजन पर केंद्रित होती है।
इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित मध्य भारत के राज्यों में दिवाली उत्सव अपनी विशिष्ट आंचलिक परंपराओं और लोक-अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ इस पर्व का आगमन फसल की कटाई के मौसम के साथ होता है। अतः कृषक समाज प्रकृति व ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अपने पशुधन (गाय-बैल एवं मवेशियों) की विशेष पूजा करता है। इस अवसर पर सामूहिक रूप से अलाव जलाने की भी प्रथा है। इसके साथ ही, यहाँ यह लोकमान्यता भी प्रचलित है कि इस अवधि में मृत्यु के देवता यमराज की पूजा नहीं की जानी चाहिए, जो इसे भारत के अन्य अंचलों से भिन्नता प्रदान करती है।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में दिवाली का पर्व विभिन्न जनजातीय व क्षेत्रीय सांस्कृतिक धाराओं का एक सुंदर संगम प्रस्तुत करता है। असम में इसे मुख्य रूप से काली पूजा के रूप में मनाया जाता है, जहाँ मणिमय दीप जलाए जाते हैं और पटाखे फोड़े जाते हैं। पर्वतीय राज्य मेघालय में एक अत्यंत मनमोहक परंपरा देखने को मिलती है, जहाँ लोग अपने घरों के साथ-साथ संपूर्ण पहाड़ियों और घाटियों पर भी दीये प्रज्वलित करते हैं, जिससे रात्रि के समय प्रकाश का एक विहंगम व अलौकिक दृश्य निर्मित हो जाता है। वहीं नागालैंड में ‘तोखू एमोंग’ नामक पारंपरिक कृषि उत्सव मनाया जाता है, जो प्रायः दिवाली की समयावधि के साथ ही पड़ता है।
इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि पूर्वी भारत में, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम जैसे राज्यों में, दिवाली की मूल चेतना पारंपरिक उत्तर भारतीय ‘श्री राम आगमन’ अथवा पश्चिमी भारत के ‘वैभव-केंद्रित लक्ष्मी पूजन’ के स्थान पर, मुख्य रूप से महाकाली की साधना (काली पूजा) के इर्द-गिर्द समाहित रहती है।
पश्चिम बंगाल तथा असम के विभिन्न क्षेत्रों में श्रद्धालु कार्तिक अमावस्या की घनी रात्रि में, देवी काली की तंत्र-मंत्र व वैदिक विधियों से उपासना करते हैं। गृहों एवं भव्य सामुदायिक पंडालों (अस्थायी पूजा मंडपों) में माँ काली की विशाल प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं और पूरी निष्ठा व श्रद्धा के साथ अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। भारत के अन्य भू-भागों की भांति ही, यहाँ भी अज्ञान रूपी अंधकार के निवारण हेतु आवासों, देवालयों और कार्यस्थलों को मिट्टी के दीयों, मोमबत्तियों तथा आकर्षक विद्युत झालरों से आलोकित किया जाता है।
ओडिशा में, इस पर्व के साथ पूर्वजों की स्मृति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने की एक अत्यंत गूढ़ परंपरा जुड़ी है। परिवारजन अपने गृह द्वार के समक्ष पटसन की सूखी लकड़ियों (काठगाड़ी) को प्रज्वलित करते हैं और “बड़ा बदुआ हो, अंधारिया आसा, आलोका जा” (हे महान पूर्वजो! अंधकार के मार्ग से आइए और इस पवित्र प्रकाश के मार्ग से स्वर्ग लोक को प्रस्थान कीजिए) का सस्वर मंत्रोच्चार करते हैं, ताकि इस पावन ज्योति के माध्यम से पितरों की आत्माओं को सद्गति व मोक्ष प्राप्त हो सके।
भवनों के मुख्य द्वारों पर चावल के घोल व प्राकृतिक रंगों से अत्यंत बारीक व कलात्मक रंगोली (अल्पना) उकेरी जाती है। इसके उपरांत, परिवारजन एक-दूसरे को पारंपरिक बंगाली व उड़िया मिष्टान्न तथा स्वादिष्ट पकवान भेंट कर पर्व का उल्लास बढ़ाते हैं।

इस क्षेत्र के कई भागों में यह लोक-रीति प्रचलित है कि दिवाली की संध्या को घरों के मुख्य द्वार खुले अथवा बिना कुंडी लगाए रखे जाने चाहिए, जो प्रतीकात्मक रूप से गृह में सुख, समृद्धि, लक्ष्मी एवं दैवीय शक्तियों के सहर्ष स्वागत का सूचक है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/45jmvh36
2. https://tinyurl.com/4pexs4ez
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