भारत में युवाओं की कहानी हमेशा से उम्मीदों और अंतर्विरोधों से भरी रही है। देश में शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके समानांतर रोजगार के अच्छे अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं। हाल ही में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि हर साल देश में 1.2 से 1.5 करोड़ युवा 18 वर्ष की आयु पूरी करके कार्यबल या उच्च शिक्षा में प्रवेश करते हैं। लाखों युवा स्कूल, कॉलेज और तकनीकी कोर्स पूरे करके एक सुरक्षित करियर की तलाश में निकलते हैं, लेकिन बाजार में अच्छी सैलरी और सामाजिक सुरक्षा वाली औपचारिक नौकरियों की भारी कमी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2024 में हरियाणा में सफाई कर्मचारी के पदों के लिए 46,000 से अधिक स्नातकों और पोस्ट-ग्रेजुएट्स ने आवेदन किया। वहीं राजस्थान में चपरासी के 18 पदों के लिए 12,000 से अधिक पेशेवर कतार में खड़े नजर आए।
भारत में शिक्षित बेरोजगारी का असली संकट क्या है?
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि 15 से 29 वर्ष की आयु के बीच 36 करोड़ से अधिक युवा हैं, जो दुनिया में सबसे बड़ी युवा आबादी है। इनमें से 26 करोड़ से अधिक युवा शिक्षा से बाहर हैं और संभावित कार्यबल का हिस्सा हैं। पिछले चार दशकों में देश में शिक्षा का परिदृश्य बदला है और कॉलेज में दाखिले बढ़े हैं, लेकिन शिक्षा से रोजगार तक का सफर टूटता हुआ नजर आ रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, 15 से 25 वर्ष की आयु के लगभग 40 प्रतिशत स्नातक बेरोजगार हैं। यह दर कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में बहुत अधिक है। पिछले कुछ वर्षों में वेतनभोगी नौकरियों का पर्याप्त संख्या में सृजन नहीं हुआ है। यहां तक कि देश के शीर्ष संस्थानों जैसे आईआईटी, एनआईटी और ट्रिपल आईटी में भी उच्च कौशल वाली नौकरियों में गिरावट आई है। 2024 में हर पांच में से दो आईआईटी स्नातक को प्लेसमेंट नहीं मिल सका। आधिकारिक बेरोजगारी दर भले ही चार से छह प्रतिशत के बीच हो, लेकिन भारत के कुल बेरोजगारों में 66 प्रतिशत युवा स्नातक या स्नातकोत्तर हैं, जो रोजगार सृजन में संरचनात्मक कमजोरियों को दर्शाता है।

क्या हमारी शिक्षा प्रणाली युवाओं को रोजगार के लिए तैयार कर रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की शिक्षा प्रणाली हर साल बड़ी संख्या में स्नातक तो तैयार कर रही है, लेकिन उन्हें वे कौशल नहीं दे पा रही जिनकी उद्योग जगत को जरूरत है। यह कौशल बेमेल बेरोजगारी के सबसे बड़े कारणों में से एक है। लगभग 33 प्रतिशत स्नातकों का कहना है कि उनके पास मौजूद कौशल उद्योग की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। उदाहरण के लिए, इंजीनियरिंग कॉलेज ऐसे कोडर तैयार कर रहे हैं जिन्हें वास्तविक डिजिटल प्रोजेक्ट्स का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं होता। सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक जोर और व्यावहारिक या व्यावसायिक प्रशिक्षण की कमी के कारण पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है।
रामपुर के युवाओं के सामने क्या चुनौतियां और विकल्प हैं?
स्थानीय स्तर पर औद्योगिक विकास और निजी क्षेत्र में नौकरियों की कमी का सीधा असर टियर-2 और टियर-3 शहरों पर पड़ रहा है। रामपुर में छात्रों और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं का रुझान तेजी से सरकारी नौकरियों, तकनीकी शिक्षा और कौशल आधारित करियर की ओर बढ़ रहा है।
रामपुर जिले में बड़ी संख्या में युवा सरकारी रोजगार को एक स्थिर और सुरक्षित करियर विकल्प मानते हैं, जिसमें नियमित वेतन, पेंशन और सामाजिक सम्मान शामिल है। यही कारण है कि हजारों छात्र कोचिंग संस्थानों और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से पुलिस, रेलवे, बैंकिंग, एसएससी और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। सरकारी नौकरी की तैयारी के साथ-साथ, रामपुर के छात्र तकनीकी और पेशेवर कौशल में सुधार के लिए इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आईटीआई), कंप्यूटर केंद्र और पॉलिटेक्निक कॉलेजों में भी प्रवेश ले रहे हैं। यहां सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, रिटेल, इलेक्ट्रिकल वर्क और डिजिटल सेवाओं में कौशल-आधारित करियर युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं ताकि वे अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकें।
तकनीकी बदलाव और ऑटोमेशन से नौकरियों पर क्या असर पड़ रहा है?
तकनीकी प्रगति और ऑटोमेशन ने आर्थिक विकास को तो बढ़ावा दिया है, लेकिन श्रम-गहन क्षेत्रों में इसका नकारात्मक असर भी पड़ा है। विनिर्माण, रिटेल और सेवा क्षेत्र में मशीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के उपयोग से मानव श्रम की आवश्यकता कम हो गई है। इसके बावजूद, नई तकनीक रोजगार के नए अवसर भी ला रही है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 तक भारत में युवाओं की भर्ती में 11 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे लगभग 1.28 करोड़ नई नौकरियां पैदा होंगी। इनमें से 30 से 40 प्रतिशत नौकरियां आईटी सेवाओं, 12 प्रतिशत विनिर्माण, 13 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा और 20 प्रतिशत फिनटेक क्षेत्र में होंगी। हालांकि, संकट यह है कि वर्तमान में केवल 45 प्रतिशत युवा ही उच्च विकास वाले तकनीकी और डिजिटल रोल्स के लिए जॉब-रेडी माने जाते हैं। एआई इंजीनियर (AI Engineer), डेटा साइंटिस्ट (Data Scientist), साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ (Cyber Security Expert) और क्लाउड आर्किटेक्ट (Cloud Architect) जैसे उच्च प्रभाव वाले रोल्स की मांग बहुत अधिक है, लेकिन उस स्तर का कौशल युवाओं के पास मौजूद नहीं है।
आर्थिक विकास के बावजूद नई नौकरियां क्यों नहीं पैदा हो रही हैं?
देश में रोजगार रहित विकास एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। आर्थिक विकास ने पर्याप्त औपचारिक नौकरियां पैदा नहीं की हैं। सेवा क्षेत्र जीडीपी में 54 प्रतिशत का योगदान देता है, लेकिन यह 30 प्रतिशत से भी कम रोजगार पैदा करता है। दूसरी ओर, कॉर्पोरेट क्षेत्र में नौकरियों में कटौती और वेतन में ठहराव देखने को मिल रहा है। प्रमुख आईटी कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2024 में 64,000 नौकरियों की कटौती की है। इसके अलावा, स्नातकों का औसत वेतन पिछले एक दशक से तीन से चार लाख रुपये प्रति वर्ष पर अटका हुआ है, क्योंकि बाजार में स्नातकों की अधिक आपूर्ति है।
सरकार रोजगार बढ़ाने के लिए क्या कदम उठा रही है?
भारत सरकार कौशल विकास, एमएसएमई, डिजिटल रोजगार और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देकर बेरोजगारी कम करने का प्रयास कर रही है। आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना के तहत नए रोजगार पैदा करने वाले एमएसएमई को वित्तीय सहायता दी जा रही है। एम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (Employment Linked Incentive Scheme) का लक्ष्य श्रम-गहन क्षेत्रों में 3.5 करोड़ नौकरियां पैदा करना है।
स्किल इंडिया मिशन के तहत अब तक देशभर में करोड़ों युवाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, जन शिक्षण संस्थान और राष्ट्रीय शिक्षुता संवर्धन योजना के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में युवाओं को उद्योग-प्रासंगिक कौशल प्रदान किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी इन योजनाओं के तहत लाखों युवाओं को ट्रेनिंग मिली है।
स्टार्ट-अप इंडिया जैसी पहलों ने युवाओं को पारंपरिक नौकरियों पर निर्भर रहने के बजाय खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया है। इसके अलावा, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विनिर्माण, रिटेल और स्थानीय व्यवसायों में नौकरियां पैदा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चंदौली जैसे जिलों में राइस मिल क्लस्टर में कॉमन फैसिलिटी सेंटर स्थापित करने जैसी पहल स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ावा दे रही हैं।
भविष्य की राह क्या होनी चाहिए?
देश में शिक्षित बेरोजगारी केवल एक श्रम का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय विकासात्मक संकट है। यदि युवाओं की इस बड़ी आबादी को सही दिशा और रोजगार नहीं मिला, तो हमारा जनसांख्यिकीय लाभांश एक जनसांख्यिकीय देनदारी में बदल सकता है।

समाधान के तौर पर शिक्षा और उद्योग के बीच सीधा तालमेल होना चाहिए। पाठ्यक्रमों में व्यावहारिक कौशल और इंटर्नशिप को शामिल किया जाना चाहिए। विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा और ग्रामीण उद्यमों जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। साथ ही, टियर-2 और टियर-3 शहरों में औद्योगिक क्लस्टर विकसित करके क्षेत्रीय विविधता लानी होगी ताकि रामपुर जैसे शहरों के युवाओं को रोजगार के लिए बड़े महानगरों की ओर पलायन न करना पड़े। जब तक शिक्षा को सीधे रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक डिग्री और नौकरी के बीच की यह खाई युवाओं के भविष्य को चुनौती देती रहेगी।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/29r5fybf
2. https://tinyurl.com/2xt7anht
3. https://tinyurl.com/22yycm85
4. https://tinyurl.com/28psmwam
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