दिवाली के रंग: रामपुर बुशहर के लवी मेले से जैन, सिख और बौद्ध परंपराओं तक

विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
08-11-2026 09:27 AM
दिवाली के रंग: रामपुर बुशहर के लवी मेले से जैन, सिख और बौद्ध परंपराओं तक

हमारे शहर रामपुर में, दिवाली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। शहर की गलियाँ, बाज़ार एवं सारे घर दीयों की रोशनी में जगमगा उठते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि हिमाचल प्रदेश राज्य में भी एक रामपुर नामक शहर है। यह शहर रामपुर बुशहर है। भारत की अन्य जगहों के समान ही, यहाँ भी पूरे हर्ष और उल्लास के साथ दिवाली मनाई जाती है। परंतु, यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा इस त्योहार को नया रूप देती है। यह परंपरा, ‘अंतर्राष्ट्रीय लवी मेले’ की है। मूल रूप से, यह एक समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला व्यापारिक मेला है, और आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी अमूल्य विरासत को संजोने तथा बढ़ावा देने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

लवी मेला 

रामपुर बुशहर शहर प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि मेले के प्रारंभ से ही सभी की पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित हो सके। इस मेले के कुछ दिनों पहले यहाँ आयोजित होने वाली घोड़ों की प्रदर्शनी भी, लवी मेले के औपचारिक शुभारंभ से पूर्व आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का एक अभिन्न अंग है। इसमें भाग लेने हेतु पड़ोसी राज्यों को भी आमंत्रित किया जाता है, तथा सरकार के पशुपालन विभाग पर, इससे संबंधित एक कार्यशाला आयोजित करने का दायित्व होता है।

इस मेले में हिमाचली कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है और उन्हें अपनी कला के प्रदर्शन हेतु मंच पर पर्याप्त समय उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही, इस जीवंत मेले के दौरान कबड्डी, मुक्केबाजी, बैडमिंटन और एक मिनी-मैराथन सहित विविध खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इस मिनी-मैराथन का मुख्य उद्देश्य नशीले पदार्थों के बढ़ते दुष्प्रभावों के प्रति जन-जागरूकता फैलाना है और आयोजन समिति के शासकीय एवं अशासकीय दोनों सदस्यों से इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया जाता है।

हम जानते हैं कि दिवाली हिंदू धर्म का सबसे प्रमुख त्योहार है। परंतु, भारत जैसे विविध देश में सभी धर्मों में इस त्योहार से जुड़ी मान्यताएँ एवं परंपराएँ हैं। जैन धर्म में, दिवाली चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष (कैवल्य/मुक्ति) संप्राप्ति दिवस की स्मृति में मनाई जाती है। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान महावीर ने 527 ईसा पूर्व में दिवाली की पावन तिथि को ही निर्वाण प्राप्त किया था। अतः यह पर्व जैन धर्मावलंबियों को अहिंसा, संयम, आत्म-अनुशासन और त्याग के मार्ग पर चलने का संदेश देता है। भगवान महावीर के उपदेशों के यही मूल स्तंभ हैं। जैन परंपरा में दिवाली केवल एक उत्सव न होकर आत्म-चिंतन, साधना और संयम का अवसर है, जिसमें उपवास, देवार्चन और जैन शास्त्रों के स्वाध्याय जैसे धार्मिक अनुष्ठान सम्मिलित हैं। श्रद्धालु दीप प्रज्वलित कर भगवान महावीर की अमर शिक्षाओं का स्मरण करते हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की कामना करते हैं।

सिख समुदाय के लोग दिवाली की समयावधि में ही 'बंदी छोड़ दिवस' (मुक्ति दिवस) मनाते हैं। यह दिन सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी की मुग़ल सम्राट जहाँगीर की कैद से ऐतिहासिक रिहाई की याद दिलाता है। सिख ग्रंथों व इतिहास के अनुसार, गुरु हरगोविंद सिंह जी ने न केवल स्वयं की मुक्ति प्राप्त की, बल्कि अपने साथ बंदी बनाए गए 52 अन्य देशी राजाओं की स्वतंत्रता भी सुनिश्चित की, जिसके पश्चात वे उन सभी के साथ श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर पधारे। इस प्रकार, सिख धर्म में दिवाली केवल स्वतंत्रता का ही पर्व नहीं है, बल्कि दया, शौर्य, भ्रातृभाव और सामुदायिक एकजुटता के मूल्यों का भी प्रतीक है। इस दिन सिख श्रद्धालु स्वर्ण मंदिर को दीपमालाओं से आलोकित करते हैं और 'सरबत दा भला' (सामूहिक कल्याण) की भावना के साथ अरदास करते हैं।

इतिहास के अनुसार, मुग़ल सम्राट जहाँगीर ने गुरु हरगोविंद साहिब जी और 52 राजाओं को ग्वालियर के किले में बंदी बनाकर रखा था। जब सम्राट से गुरु हरगोविंद जी को रिहा करने का आग्रह किया गया, तो वह सहमत हो गया। किंतु गुरु साहिब ने यह शर्त रखी कि उनके साथ उन सभी 52 बंदी राजाओं को भी मुक्त किया जाए। सम्राट ने शर्त स्वीकार तो कर ली, किंतु एक युक्ति लगाते हुए कहा कि केवल वही राजा जेल से बाहर आ सकेंगे, जो गुरु साहिब के चोले (वेशभूषा) के छोर को पकड़ सकेंगे। सम्राट का उद्देश्य रिहा होने वाले बंदियों की संख्या को सीमित करना था। किंतु, सर्वज्ञ गुरु हरगोविंद जी ने विशेष रूप से 52 कलीदार छोरों (लटकनों/कलियों) वाला एक चोला तैयार करवाया, जिससे प्रत्येक राजा एक-एक छोर को थामकर गरिमा के साथ जेल से सुरक्षित बाहर निकल आया।

उस दिन, सिखों ने गुरु हरगोविंद साहिब जी के अमृतसर आगमन की पावन खुशी में संपूर्ण स्वर्ण मंदिर परिसर को दीपमालाओं से प्रज्वलित कर अद्भुत उत्सव मनाया था, और दीपमाला की यह अलौकिक परंपरा आज भी उसी अपार श्रद्धा एवं उल्लास के साथ निरंतर चली आ रही है।

दूसरी ओर, बौद्ध धर्म में दिवाली उस ऐतिहासिक अवसर के रूप में स्मरणीय है, जब तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के महान सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की थी। आरंभ में एक कड़े शासक रहे सम्राट अशोक ने, कलिंग युद्ध की विभीषिका व नरसंहार से द्रवित होकर बौद्ध धर्म अंगीकार किया और हिंसा त्याग कर शांति, करुणा एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग चुना। इस दिन ज्ञान और सम्यक करुणा के प्रतीक स्वरूप पूर्ण श्रद्धाभाव से दीपक जलाए जाते हैं।

दिवाली का यह पावन पर्व विभिन्न समुदायों को उल्लास, प्रेम और भातृत्व की भावना से एक सूत्र में पिरोकर सर्वत्र खुशियाँ बिखेरता है। भारत के अधिकांश भागों में घरों, देवालयों और गलियों को मिट्टी के दीयों की पंक्तियों तथा रंगों व पुष्पों से निर्मित कलात्मक रंगोलियों से सजाया जाता है। ये सभी शुभता, प्रकाश और सकारात्मकता का संचार करती हैं। परिवारजन अपने गृहों की स्वच्छता एवं सौंदर्य-सज्जा हेतु एकत्र होते हैं तथा परस्पर प्रेम व सौहार्द व्यक्त करने के लिए उपहारों व मिष्टान्न का आदान-प्रदान करते हैं।

 

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/5b5w43zd

2. https://tinyurl.com/yc5wabcb

3. https://tinyurl.com/dpu2cpum

Definitions of the Post Viewership Metrics

A. City Readerships (FB + App) - This is the total number of city-based unique readers who reached this specific post from the Prarang Hindi FB page and the Prarang App.

B. Website (Google + Direct) - This is the Total viewership of readers who reached this post directly through their browsers and via Google search.

C. Messaging Subscribers - This is the total viewership from City Portal subscribers who opted for hyperlocal daily messaging and received this post.

D. Total Viewership - This is the Sum of all our readers through FB+App, Website (Google+Direct), Email, WhatsApp, and Instagram who reached this Prarang post/page.

E. The Reach (Viewership) - The reach on the post is updated either on the 6th day from the day of posting or on the completion (Day 31 or 32) of one month from the day of posting.