पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म करने वाले ब्रिक्स की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है?

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पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म करने वाले ब्रिक्स की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है?

क्या आप जानते हैं कि आज एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय समूह उभर चुका है जो दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है? यह समूह कोई और नहीं बल्कि 'ब्रिक्स' (BRICS) है, जिसने पिछले दो दशकों में एक प्रमुख राजनीतिक ताक़त के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इस समूह का जन्म अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में पश्चिमी देशों के दबदबे को चुनौती देने और विकासशील देशों को एक नया विकल्प प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ था। हाल ही में इस समूह का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, जिसने इसकी ताक़त को तो बढ़ाया ही है, लेकिन साथ ही इसके भीतर कुछ नए कूटनीतिक विवादों को भी जन्म दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि ब्रिक्स क्या है, यह कैसे काम करता है और दुनिया के भविष्य के लिए इसके क्या मायने हैं। 

ब्रिक्स क्या है और वर्तमान में कौन से देश इसका हिस्सा हैं?
ब्रिक्स एक अनौपचारिक समूह है जो मुख्य रूप से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों) के लिए एक राजनीतिक और कूटनीतिक समन्वय मंच के रूप में कार्य करता है। वर्तमान में यह ग्यारह देशों का एक मज़बूत समूह बन चुका है। इसके पाँच मूल सदस्य ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इसके अलावा वर्ष दो हज़ार चौबीस-पच्चीस में इसमें छह नए सदस्यों को शामिल किया गया है, जिनके नाम मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात हैं। सदस्य देशों के अलावा, इस समूह ने एक 'पार्टनर देश' (साझेदार देश) की श्रेणी भी बनाई है। वर्ष दो हज़ार चौबीस के कज़ान शिखर सम्मेलन में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज़्बेकिस्तान को साझीदार देश घोषित किया गया। इसके तुरंत बाद वियतनाम को भी दसवें साझीदार देश के रूप में आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया गया, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में गहराई से जुड़ा एक अहम एशियाई देश है। ब्रिक्स में निर्णय आम सहमति के आधार पर लिए जाते हैं और इसके सदस्य देश सभी बैठकों में भाग लेते हैं।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विचार से ब्रिक्स का निर्माण कैसे हुआ और यह कैसे आगे बढ़ा?
ब्रिक्स की शुरुआत महज़ एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। वर्ष दो हज़ार एक में गोल्डमैन सैक्स निवेश बैंक के एक अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की तेज़ आर्थिक वृद्धि को देखते हुए 'ब्रिक' शब्द गढ़ा था। उनका मानना था कि इन देशों का विकास भविष्य में अमीर देशों के समूह जी-सात को कड़ी चुनौती देगा। इस विचार को ज़मीनी हक़ीक़त में बदलने की शुरुआत रूस ने की, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी ताक़तों के ख़िलाफ़ एक समानांतर शक्ति खड़ी करने के लिए इन चारों देशों की बैठक बुलाई। ब्रिक की पहली मंत्री स्तरीय बैठक वर्ष दो हज़ार छह में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई थी। इसके बाद वर्ष दो हज़ार नौ में रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों का पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। वर्ष दो हज़ार ग्यारह में चीन के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका को भी इस समूह में शामिल कर लिया गया, जिसके बाद इस समूह का नाम 'ब्रिक' से बदलकर 'ब्रिक्स' हो गया। 

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इस समूह को बनाने का मुख्य कारण क्या था और यह वैश्विक व्यवस्था में कैसे बदलाव लाना चाहता है?
ब्रिक्स का गठन इस बुनियादी सोच पर आधारित था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर पश्चिमी ताक़तों का एकाधिकार हो चुका है और ये संस्थाएं अब विकासशील देशों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रही हैं। ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार लाना है ताकि उनकी वैधता और प्रभावशीलता बढ़ सके। विशेष रूप से वर्ष दो हज़ार आठ के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इन देशों ने महसूस किया कि अंतरराष्ट्रीय शासन प्रणाली में उभरते हुए देशों को उनकी आर्थिक ताक़त के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा था कि ब्रेटन वुड्स प्रणाली (जिसके तहत विश्व बैंक और आईएमएफ बने थे) अमीर देशों द्वारा अमीर देशों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई थी, और इसमें अफ़्रीकी देशों की कोई भागीदारी नहीं थी। इसी पश्चिमी आधिपत्य और वित्तीय असंतुलन को ख़त्म करने के लिए ब्रिक्स देशों ने एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाया। 
 

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2024 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन


सदस्य देशों के बीच वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग में इसकी क्या भूमिका है?
ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी वित्तीय प्रणाली पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को कम करना ब्रिक्स का एक प्रमुख एजेंडा रहा है, क्योंकि डॉलर पर निर्भरता के कारण इन देशों को पश्चिमी प्रतिबंधों का ख़तरा बना रहता है। इस दिशा में 'डी-डॉलरीकरण' को बढ़ावा देते हुए स्थानीय मुद्राओं, ख़ासकर चीन की मुद्रा रेनमिन्बी, में व्यापार बढ़ाया जा रहा है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा तो ब्रिक्स देशों के लिए एक साझा मुद्रा बनाने की भी पुरज़ोर वकालत कर चुके हैं। विश्व बैंक और आईएमएफ के विकल्प के तौर पर ब्रिक्स ने 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (एनडीबी) और 'कंटिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट' (सीआरए) की स्थापना की है। न्यू डेवलपमेंट बैंक मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन और सामाजिक विकास जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ऋण मुहैया कराता है और इसका लक्ष्य अपने कुल प्रोजेक्ट्स का चालीस प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन से निपटने में लगाना है। हालाँकि एनडीबी का आकार अभी विश्व बैंक से बहुत छोटा है, लेकिन यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करने में एक अहम हथियार साबित हो रहा है। 

File:Map of BRICS countries.svg
ब्रिक्स देशों का नक्शा

ब्रिक्स का हालिया विस्तार कैसे हो रहा है और वैश्विक प्रभाव के लिए इसके क्या मायने हैं?
हाल के वर्षों में ब्रिक्स का आकर्षण तेज़ी से बढ़ा है। वर्ष दो हज़ार तेईस के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के दौरान छह नए देशों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। इनमें से अर्जेंटीना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि वहाँ के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने कम्युनिस्ट देशों के साथ गठबंधन न करने और पश्चिमी देशों के साथ नज़दीकियां बढ़ाने का फ़ैसला किया था। लेकिन अन्य देशों के जुड़ने से अब इस समूह में अरब जगत की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं (सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात) और उप-सहारा अफ़्रीका की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (इथियोपिया) शामिल हो गई हैं। हालाँकि इस विस्तार के साथ ही समूह के भीतर गुटबाज़ी और विवाद भी बढ़ने लगे हैं। चीन और भारत के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद और 'ग्लोबल साउथ' का नेता बनने की होड़ एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमले के कारण भी समूह के सामने कूटनीतिक मुश्किलें खड़ी हुई हैं।

आने वाला समय ब्रिक्स के लिए चुनौतियों से भरा है। जुलाई दो हज़ार पच्चीस में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में हुई शिखर सम्मेलन से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किनारा कर लिया था। शी जिनपिंग ने अपनी अनुपस्थिति का कारण व्यस्त कार्यक्रम बताया, जबकि पुतिन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी गिरफ़्तारी वारंट के कारण सम्मेलन में नहीं जा रहे थे। इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिक्स को लेकर सख़्त रवैया अपनाते हुए कहा है कि "ब्रिक्स मर चुका है" और उन्होंने डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिश करने वाले ब्रिक्स देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी भी दीै। इन तमाम आंतरिक मतभेदों और बाहरी दबावों के बावजूद, वर्ष दो हज़ार चौबीस में तीस से अधिक देशों ने इस समूह में शामिल होने के लिए आवेदन किया था, जिनमें अज़रबैजान, मलेशिया और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि पश्चिमी एकाधिकार के ख़िलाफ़ एक नए बहुध्रुवीय विश्व की चाहत अभी भी ज़िंदा है और ब्रिक्स इसका सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है।  

संदर्भ 
1. https://tinyurl.com/28ksdgux
2. https://tinyurl.com/y35mvnzm
3. https://tinyurl.com/2awxslf9
4. https://tinyurl.com/2y6lasrm
5. https://tinyurl.com/2652hmcn 

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