मध्यकालीन दिल्ली का बेजोड़ विवरण:हिंदी महाकाव्य पृथ्वीराज रासो व् फ़ारसी ग्रंथ नूह सिफिर में

प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
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मध्यकालीन दिल्ली का बेजोड़ विवरण:हिंदी महाकाव्य पृथ्वीराज रासो व् फ़ारसी ग्रंथ नूह सिफिर में

क्या आप जानते हैं कि जिस दिल्ली को आज हम भारत के दिल के रूप में पहचानते हैं, उसके इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब उसके 20 अलग-अलग नाम हुआ करते थे? महान कवि अमीर खुसरो ने इसी शहर के बारे में लिखा था कि यहाँ की वास्तुकला और कुतुब मीनार इतनी भव्य हैं कि वे सीधे "तारों से हाथ मिलाती हैं"। यह कोई साधारण शहर नहीं है, बल्कि यह वह ज़मीन है जिसे कभी 'इंद्रप्रस्थ' तो कभी 'योगिनीपुर' कहा गया। आज के इस लेख में हम इतिहास के उन्हीं पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि कैसे मध्यकालीन भारत (1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी) के दौरान बसाई गई यह छोटी सी बस्ती आज की आधुनिक राजधानी में तब्दील हो गई। आइए, 'पृथ्वीराज रासो' की ऐतिहासिक पंक्तियों और सूफी संत अमीर खुसरो की नज़रों से इस शहर के इस बेमिसाल सफर को विस्तार से समझें। 

'पृथ्वीराज रासो' क्या है और यह मध्यकालीन इतिहास का सबसे अहम दस्तावेज़ क्यों माना जाता है?
हिंदी साहित्य के मध्यकालीन दौर में लिखा गया 'पृथ्वीराज रासो' भारत के सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक माना जाता है। यह महाकाव्य 12वीं शताब्दी के महान राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के जीवन और उनकी वीरतापूर्ण लोककथाओं का विस्तृत वर्णन करता है, जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया था। इस महाकाव्य की रचना चंद बरदाई ने की थी, जो न केवल राजा पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे, बल्कि उनके बहुत अच्छे मित्र और सलाहकार भी थे। इस ऐतिहासिक ग्रंथ को कुल 69 अध्यायों में बाँटा गया है, जिन्हें 'समय' कहा जाता है।

शुरुआती दौर में यह ग्रंथ केवल मौखिक परंपरा (सुनाने और याद रखने) के रूप में ही जीवित था, लेकिन 18वीं शताब्दी में इसे देवनागरी लिपि और ब्रजभाषा में उकेरा गया। बाद में 19वीं शताब्दी में पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या द्वारा इसके संपूर्ण संकलन पर आधारित मुद्रित संस्करण (Printed Editions) प्रकाशित किए गए। इस ग्रंथ में इतिहास और काल्पनिक किंवदंतियों का एक अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है, जो हमें उस दौर के समाज और दिल्ली के शुरुआती स्वरूप को समझने में बहुत मदद करता है।

प्राचीन काल के इंद्रप्रस्थ से लेकर मध्यकालीन 'ढिल्ली' तक का सफर कैसे तय हुआ?
'पृथ्वीराज रासो' में दिल्ली की प्राचीन बस्तियों के बारे में बेहद चौंकाने वाली जानकारियाँ दी गई हैं। इस महाकाव्य में इस जगह के बीस अलग-अलग नामों का ज़िक्र मिलता है, जिनमें जुग्गिनीपुर, जोग नायर, योगिनीपुर, इंद्रप्रस्थ, इंद्रप्रस्थय, इंद्रप्रस्थपुर, ढिल्ली, ढिल्लिया, ढिल्लरी, दिल्ली, दिल्लीपुर, दिल्लीधरा, दिल्लीपुरम, दिल्लीपति, दिल्लीदेसी, दिल्लीनगर, दिल्ली वासा, ढिल्लियादेस, ढिल्लेसा और दिल्लीनरेसा शामिल हैं।

ग्रंथ के 'आदि पर्व' (समय 1) की शुरुआत यमुना नदी के तट पर निगम बोध घाट के पास 'दिली' नामक जगह पर बीसलदेव (धुंधा) के आगमन और दिल्ली की बस्ती बसने के साथ होती है। इसे एक पवित्र मंडल के रूप में वर्णित किया गया है जहाँ कई मंदिर मौजूद थे। इसी के पास निगम बोध के निकट एक योगिनी की गुफा और 'सारंगवापल' नामक एक जलाशय का भी ज़िक्र किया गया है। ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि दिल्ली के पास 'बहिलवन' नामक एक जंगल हुआ करता था, जो संभवतः थानेश्वर में था। कहानी में भविष्यवाणी की गई थी कि दिल्ली को सोमेश्वर के पुत्र (पृथ्वीराज) द्वारा सुशोभित किया जाएगा, जिनका जन्म बहिलवन में रहने के लिए ही हुआ था। महाकाव्य बताता है कि जुग्गिनीपुर वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ पृथ्वीराज चौहान का राज्याभिषेक बिल्कुल महाभारत के राजा युधिष्ठिर की तरह ही किया गया था। 

'दिल्ली-किल्ली कथा' क्या है और इसके पीछे की ऐतिहासिक घटना क्या बयां करती है?
दिल्ली की बुनियाद को समझने के लिए 'पृथ्वीराज रासो' के तीसरे अध्याय (समय 3) में वर्णित 'दिल्ली-किल्ली कथा' एक बेहद महत्वपूर्ण लोककथा है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे अनंगपाल ने निगम बोध के पास एक नई बस्ती बसाई थी। इस जगह को एक सुरक्षित और शक्तिशाली केंद्र बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन इतिहास हमेशा एक सा नहीं रहता। इस कथा के अनुसार, गहरवाल राजवंश के राजा विजयपाल (विजयचंद्र) ने जब इस क्षेत्र पर एक बड़ा हमला किया, तो अनंगपाल की इस बस्ती को भारी नुकसान पहुँचा। इस भयंकर आक्रमण के बाद, इस बस्ती को छोड़ना पड़ा और अपना मुक्काम (ठिकाना) कालिंदी के उत्तर की ओर स्थानांतरित करना पड़ा। यह लोककथा इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि मध्यकालीन दौर में यह क्षेत्र किस तरह लगातार युद्धों, उथल-पुथल और सत्ता के बदलाव का गवाह बन रहा था, जिसने इसकी भौगोलिक और राजनीतिक पहचान को पूरी तरह बदल कर रख दिया। 

अमीर खुसरो कौन थे और उन्होंने दिल्ली को 'धरती का स्वर्ग' क्यों करार दिया था?
मध्यकालीन भारत के सबसे महान विद्वानों में से एक अमीर खुसरो का जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली (जो कि वर्तमान कासगंज ज़िले में है) में हुआ था। तुर्की मूल के अमीर खुसरो के भीतर रहस्यवाद (सूफीवाद), गहरी विद्वता, इतिहास की समझ, संगीत और कविता का एक बेजोड़ संगम देखने को मिलता है। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के पाँच अलग-अलग सुल्तानों के दरबार में एक फ़ारसी भाषा के कवि के रूप में अपनी सेवाएँ दी थीं।

उन्होंने सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के लिए 'नूह सिफिर' (अर्थात नौ सफ़र) नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा था। इस ग्रंथ के 'तीसरे सिफिर' में उन्होंने 'हिंद' (भारत) और यहाँ के लोगों, उनकी भाषाओं, ब्राह्मणवादी ज्ञान और विद्या, यहाँ की कलाओं और विज्ञान, यहाँ के पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और यहाँ की सुखद जलवायु का इतना अद्भुत वर्णन किया है कि इसे सचमुच "धरती का स्वर्ग" (पैराडाइज़ ऑन अर्थ) करार दिया है। अमीर खुसरो के लिए दिल्ली उनका सबसे प्रिय और चहेता शहर था। उन्होंने बड़े गर्व से लिखा था कि उस समय की दिल्ली, इस्लामी दुनिया के सबसे महान और बड़े केंद्रों जैसे बगदाद, काहिरा, खुरासान और बुखारा को भी कड़ी टक्कर दे सकती थी। 

कुतुब मीनार को 'तारों से हाथ मिलाने वाला' क्यों कहा गया और शहर की वास्तुकला कैसी थी?
अमीर खुसरो केवल दिल्ली की संस्कृति के दीवाने नहीं थे, बल्कि वे यहाँ की परिष्कृत भाषा और भव्य वास्तुकला (आर्किटेक्चर) के भी मुरीद थे। उन्होंने अपने लेखों में दिल्ली की आलीशान इमारतों का ख़ास ज़िक्र किया है, जिनमें 'क़स्र-ए-नौ' (नया महल) और 'क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' सबसे प्रमुख हैं। कुतुब मीनार की ऊँचाई और उसकी भव्यता से प्रभावित होकर अमीर खुसरो ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से लिखा था कि यह मीनार "तारों से हाथ मिलाती है"।

इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय कारीगरों की तारीफ़ में यह भी जोड़ा कि दिल्ली में जो शिल्प कौशल और वास्तुकला मौजूद है, वह पूरी अरब या फ़ारसी दुनिया में बनाई गई किसी भी इमारत से कहीं ज़्यादा उत्कृष्ट और बेहतर है। उनका यह नज़रिया दिखाता है कि उस दौर की दिल्ली केवल एक राजनीतिक राजधानी नहीं थी, बल्कि यह ज्ञान, कला और अद्भुत वास्तुकला का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बन चुकी थी जिसकी चमक दूर-दूर तक फैली हुई थी। 

File:KITLV 91999 - Unknown - Qutub minaret at the Quwwat-ul-Islam mosque in Delhi, India - Around 1860.tif

सदियों का सफर तय करके पुरानी 'ढिल्ली' आधुनिक भारत की 'नई दिल्ली' कैसे बन गई?
समय का पहिया घूमता रहा और मध्यकालीन सल्तनतों और साम्राज्यों का दौर ख़त्म होने के बाद अंग्रेज़ों का शासन भारत पर काबिज़ हुआ। एक लंबे समय तक भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी। लेकिन दिल्ली का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व हमेशा से ही बहुत ख़ास रहा था। इसी अहमियत को समझते हुए, दिसंबर 1911 में अंग्रेज़ों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का ऐतिहासिक फैसला किया।

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राजधानी को दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए और एक सुनियोजित शहर बसाने के मक़सद से 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894' (लैंड एक्विजिशन एक्ट) के तहत ज़मीन अधिग्रहित की गई। इसके बाद एक नए शहर की रूपरेखा तैयार की गई जिसे हम आज आधुनिक 'नई दिल्ली' के रूप में जानते हैं। यह वही ज़मीन है जिसने प्राचीन इंद्रप्रस्थ के किस्से सुने, अनंगपाल के दौर की उथल-पुथल देखी, अमीर खुसरो की सूफी कविताएँ सुनीं और फिर एक आधुनिक वैश्विक राजधानी के रूप में खुद को स्थापित किया। 

संदर्भ 
1. https://tinyurl.com/2db8ylrr
2. https://tinyurl.com/2yvsv9d2
3. https://tinyurl.com/2a2cm5ck
4. https://tinyurl.com/28rcsze8
5. https://tinyurl.com/2bodq49s 

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