अरुणाचल प्रदेश की न्यीशी जनजाति की ब्योपा टोपी, प्रकृति के साथ सामंजस्य बयां करती है

अवधारणा II - नागरिक की पहचान
27-07-2026 09:25 AM
अरुणाचल प्रदेश की न्यीशी जनजाति की ब्योपा टोपी, प्रकृति के साथ सामंजस्य बयां करती है

जौनपुर, हम आपको बता दें कि हमारे देश के पूर्वोत्तर राज्य - अरुणाचल प्रदेश की जंगली पहाड़ियों में, न्यीशी जनजाति वास करती है। यह जनजाति, एक समय अपनी पारंपरिक सिर टोपी को बड़े हॉर्नबिल (Hornbill) (धनेश पक्षी) की चोंचों से सजाती थी, जो गर्व और योद्धा प्रवृत्ति का प्रतीक थी। लेकिन जैसे-जैसे ये पक्षी कम होने लगे, वही लोग जो कभी उनका शिकार करते थे, उनके सबसे बड़े रक्षक बन गए। आज, न्यीशी शिल्पकार बिना किसी हॉर्नबिल पक्षी की जान लेकर भी, अपनी संस्कृति को जीवित रखते हुए, बांस और लकड़ी से हूबहू चोंच बनाते हैं।

गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों के माध्यम से, अरुणाचल प्रदेश में हॉर्नबिल एक प्रतीक से आगे बढ़कर, सह-अस्तित्व का एक पवित्र तत्व है। जनजाति के बुजुर्ग, युवाओं को सिखाते हैं कि, हॉर्नबिल की रक्षा करना जंगल की रक्षा करना है, क्योंकि ये पक्षी बीज वाहक हैं। न्यीशी हृदयभूमि में ऐसा संरक्षण, कानून द्वारा नहीं, बल्कि प्रेम द्वारा किया जाता है।

न्यीशी जनजाति अरुणाचल प्रदेश की मूल जनजातियों में से एक है, और प्रकृति के साथ घनिष्ठ सामंजस्य में रहती है। वे भोजन, आश्रय, चिकित्सा, जादु या धार्मिकं, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं व अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इसी तरह, ब्योपा, उनके हस्तनिर्मित सांस्कृतिक पोशाकों में से एक प्रकार है, और इसका उपयोग पारंपरिक टोपी के रूप में किया जाता है। पहले, इसे पारंपरिक रूप से पुजारी (न्यूब) द्वारा जादू या धार्मिक प्रथाओं के दौरान, और अन्य सदस्यों द्वारा अपने दैनिक जीवन में पहना जाता था। हालांकि, आजकल यह सांस्कृतिक पोशाक न्यीशी दिवस, न्योकुम त्यौहार और विवाह उत्सव जैसे शुभ अवसरों के दौरान ही पहनी जाती है।

ब्योपा को इसके कारीगरों और स्थानीय लोगों के कल्याण के लिए, भौगोलिक संकेत (जीआई) के माध्यम से संरक्षित करने की आवश्यकता है। दरअसल, इस पारंपरिक टोपी का मुख्य आधार या ढांचा, बेंत की विशेष स्थानीय प्रजातियों से बुना जाता है, जो इसे मजबूती और निश्चित आकार प्रदान करता है। इस टोपी की सबसे प्रमुख विशेषता इसके सामने के हिस्से पर लगी हॉर्नबिल की प्रतिकृति चोंच होती है। पहले इसके लिए असली पक्षी की चोंच का उपयोग होता था, लेकिन वन्यजीव संरक्षण के चलते, अब इसे स्थानीय लकड़ियों को तराश कर बनाया जाता है। इस चोंच के पिछले हिस्से की ओर, सजावट के लिए एक पंख लगाया जाता है। वर्तमान समय में, इसके लिए पालतू मस्कोवी बत्तख के पंखों का उपयोग किया जाता है। टोपी के पिछले हिस्से को सजाने के लिए, हालांकि कृत्रिम बालों का प्रयोग किया जाता है। पुराने समय में, जनजाति के पुरुष लंबे बाल रखते थे, और उन्हें टोपी के पीछे बांधते थे। लेकिन, बदलते दौर में इसकी जगह कृत्रिम बालों ने ले ली है। इन बालों को आकर्षक बनाने के लिए इन्हें पीले, हरे और लाल रंग के सूती धागों से लपेटा जाता है, और इस पूरी संरचना को स्थानीय रूप से ‘दुमसो’ कहा जाता है।

इस टोपी को सिर और माथे पर मजबूती से टिकाए रखने के लिए, एल्युमिनियम या बांस से बनी विशेष सुई जैसी पिनों का उपयोग किया जाता है। इनमें एक लंबी सुई जैसी संरचना होती है, जिसे दुमसो पर फिट किया जाता है, ताकि माथे के पास बालों को बांधा जा सके। इसी के साथ, एक छोटी पिन लगाई जाती है।

ब्योपा बनाने में शामिल कारीगर, मुख्य रूप से पुरुष थे। सबसे पहले, गुंबद के आकार में बुनी हुई पोडम नामक बेंत की टोपी पर काम किया जाता है, जिसे पक्षी की चोंच का अनुकरण करने के लिए, पीछे की तरफ थोड़ा बढ़ाया जाता है। फिर, बांस की एक छड़ी पर, एक सिरे से बेंत का एक टुकड़ा बांधा जाता है। छोटे चाकू से धागों को काटा जाता है, जबकि मोटे धागों को एक सुई का उपयोग करके पतले धागों पर बुना जाता है। इन मोटे धागों को स्थानीय रूप से ‘प्यालो’, और सुई को ‘साइलो’ के रूप में जाना जाता है।

एक बार बुनने के बाद, बेंत की टोपी को रंगा जाता है, और धूप में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके पश्चात, इस पर सजावट की जाती है। औसतन, एक कारीगर को एक पूर्ण टोपी बनाने में, लगभग चार से पांच दिन लगते हैं। एक बार तैयार होने के बाद, टोपी को थोड़ा सा झुकाकर पहना जाता है, जिससे माथे के ऊपर एक गांठ बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।

2001 में, अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट जैसे गैर सरकारी संगठनों ने, लुप्तप्राय पक्षी प्रजाति – हॉर्नबिल की रक्षा के लिए न्यीशी समुदाय के साथ काम करना शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप पुराने, पक्षी-आधारित ब्योपा को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का सामुदायिक समर्थन प्राप्त हुआ। इस कदम को ब्योपा के निर्माताओं और पहनने वालों से व्यापक समर्थन मिला है, और हाल के वर्षों में सामूहिक प्रयासों ने हॉर्नबिल आबादी को फिर से बढ़ने में मदद की है।

ब्योपा की अरुणाचल प्रदेश के सांस्कृतिक परिदृश्य में मजबूत पकड़ बनी हुई है, और यह स्थानीय बाजारों में आसानी से उपलब्ध है। वास्तव में, चोंच से इसकी प्रतिकृतियों तक हुए, समुदाय के नेतृत्व वाले बदलाव ने शिल्प की पहचान में संरक्षण संदेश अंतर्निहित कर दिया है।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/2fmfp6wm 

2. https://tinyurl.com/4kbwvejc 

3. https://tinyurl.com/bdhc5sr6 

4. https://tinyurl.com/ym26kxyy 

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