आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?

विचार II - दर्शन/गणित/चिकित्सा
02-10-2026 09:10 AM
आईए याद करें, क्यों माना गाँधी जी ने, सत्य, करुणा और नैतिकता को, धर्म के प्रमुख स्तंभ ?

जौनपुर की शांत और सुरीली सुबहों में निकलने वाली प्रभात फेरियों की तरह ही, बापू का जीवन भी आध्यात्मिकता और भजनों की मिठास से भरा हुआ था। गांधी जी के लिए धर्म कभी भी बँटवारे या कट्टरपन का ज़रिया नहीं रहा; उनके लिए तो यह इंसान के दिल में छिपी दिव्यता की एक बहुत ही निजी और दार्शनिक खोज थी। आज के दौर में, जहाँ धर्म को लेकर कई तरह की गलतफ़हमियाँ फैली हुई हैं, वहाँ बापू के विचार हमें एक बिल्कुल नई राह दिखाते हैं। इस लेख में हम महात्मा गांधी के धार्मिक दर्शन, उनके आश्रमों में सबके साथ गाए जाने वाले भजनों की अहमियत, और उनके सबसे प्यारे भजन से मिलने वाले हमदर्दी के संदेश को गहराई से समझेंगे। ये बातें आज के सामाजिक और क़ानूनी माहौल में कितनी सटीक बैठती हैं, यह जानकर आप भी अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति और सबको साथ लेकर चलने की सोच अपना सकेंगे।

क्या गांधी जी के लिए धर्म का अर्थ केवल सत्य और नैतिकता की खोज था? 
पश्चिम बंगाल की रायगंज यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. इति चट्टोपाध्याय के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, गांधी जी का धर्म किसी संस्था या इमारत तक सीमित नहीं था। उनका पक्का यकीन था कि धर्म उन सभी मान्यताओं की जड़ है जो हमें ईश्वर या सच्चाई का एहसास कराता है। उनके लिए 'सत्य ही ईश्वर है' और ईश्वर के प्रति यही लगन सच्चा धर्म है। गांधी जी मानते थे कि कोई भी इंसान धर्म के बिना जी नहीं सकता। यहाँ तक कि भगवान को न मानने वाला नास्तिक इंसान भी किसी न किसी उसूल के रूप में ईश्वरीय ताक़त से जुड़ा होता है। धर्म में इंसान के स्वभाव को साफ़ करने और उसे बेहतर बनाने की गज़ब की ताक़त होती है। उन्होंने सभी धर्मों के बीच आपसी तालमेल, सहनशीलता और सम्मान पर बहुत ज़ोर दिया। बापू का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ एक ही धर्म सच्चा नहीं हो सकता, बल्कि लोगों के हिसाब से कई धर्म हो सकते हैं। एकतरफ़ा सोच रखने के बजाय, हमें सहनशील होना चाहिए। अपनी इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सात अंधे लोगों और एक हाथी का मशहूर उदाहरण दिया, जहाँ हर इंसान अपनी-अपनी जगह सही था। इसी 'अनेकांतवाद' यानी बहुलता के सिद्धांत ने उन्हें हर धर्म को उसी के नज़रिए से देखने की समझ दी। बापू ने हिंदू धर्म का निष्काम कर्म, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा, और ईसाई धर्म के प्यार और माफ़ी जैसे गुणों को खुशी-खुशी अपनाया। उन्होंने ज़बरदस्ती धर्म बदलने का कड़ा विरोध किया। वे कहते थे कि अगर कोई ईसाई व्यक्ति हिंदू धर्म अपनाना चाहता है, तो उसे यह समझाना चाहिए कि जो भागवत में लिखा है, वही बाइबिल में भी है; इसलिए उसे एक और बेहतर ईसाई बनने की कोशिश करनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि जो धर्म रोज़मर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाता, वह धर्म कहलाने के लायक़ ही नहीं है। तर्क और नैतिकता उनके धर्म के दो सबसे बड़े खंभे थे। उनका दर्शन 'आध्यात्मिक मानववाद' है, जहाँ इंसान सबसे अहम है और इंसानियत की भलाई ही सबसे बड़ा मक़सद है।

आश्रमों में संगीत और 'वैष्णव जन तो' भजन हमें क्या सिखाता है? 
गांधी जी मानते थे कि संगीत हमारी आत्मा की आवाज़ है। उनके आश्रमों में रोज़ाना एक साथ बैठकर भजन गाने की बहुत प्यारी सी परंपरा थी, जिसने सभी आश्रमवासियों के बीच एकता की भावना को मज़बूत किया। इन भजनों में सबसे ख़ास और उनका सबसे पसंदीदा भजन था—'वैष्णव जन तो तेने कहिये'। यह मशहूर गुजराती भजन 15वीं सदी के महान कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था। बापू ने इसे अपनी रोज़मर्रा की प्रार्थनाओं में शामिल किया था और उनकी बैठकों से पहले इसे हमेशा गाया जाता था। इस भजन के बोलों में ज़िंदगी का एक बहुत गहरा फलसफ़ा छिपा है। भजन की पंक्तियाँ कहती हैं कि असली वैष्णव (भगवान का भक्त) वही है जो दूसरों के दर्द को अपना समझे, दूसरों के दुख दूर करके उन पर उपकार करे, लेकिन मन में कभी घमंड न लाए। वह पूरी दुनिया में सबका सम्मान करता है, किसी की बुराई नहीं करता और अपनी बातों, कामों और मन को एकदम साफ़ रखता है। ऐसा इंसान सबको एक नज़र से देखता है, लालच छोड़ देता है, पराई औरत को माँ के समान मानता है, कभी झूठ नहीं बोलता और दूसरे के पैसे को हाथ तक नहीं लगाता। उसके मन में कोई मोह-माया नहीं होती और वह वैराग्य अपनाकर बस राम के नाम में मगन रहता है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौक़े पर दुनिया भर के 150 से ज़्यादा देशों के कलाकारों ने राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देने के लिए इस भजन को अपनी आवाज़ दी। (Armenia) से लेकर (Angola), श्रीलंका से लेकर (Serbia), (Iraq) और (Iceland) तक के मशहूर स्थानीय कलाकारों ने इस भजन की पहुँच को पूरी दुनिया में साबित कर दिया। बापू के दिल के सबसे करीब रहने वाले इस गीत में करुणा और सेवा का गहरा संदेश छिपा है। यह संगीत सिर्फ़ आश्रम के रूटीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि आत्मा की आवाज़ भी था।  आप गांधी जी के इस प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' की मधुर प्रस्तुति इस वीडियो लिंक के माध्यम से सुन सकते हैं: 

जिसने दुनिया भर के श्रोताओं को शांति का संदेश दिया है।

क्या न्यायिक प्रणाली में भी गांधीवादी सहानुभूति (एम्पैथी) की आवश्यकता है? 
सामाजिक न्याय के लिए हमदर्दी या सहानुभूति को सबसे ज़रूरी माना जाता है। सामाजिक न्याय वह आदर्श स्थिति है जहाँ समाज के हर इंसान को बराबर मूल अधिकार, सुरक्षा, मौक़े और सामाजिक फ़ायदे मिलते हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए 14 अगस्त 2021 को गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति और जी डी गोयनका यूनिवर्सिटी ने 'न्यायिक सहानुभूति, न्यायशास्त्र और न्याय' विषय पर एक ख़ास लेक्चर आयोजित किया। इस प्रोग्राम में दुनिया के जाने-माने क़ानूनी शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर उपेंद्र बक्शी ने अपनी बातें रखीं। कई दशकों तक यह माना जाता था कि क़ानून और न्याय के उसूलों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, ताकि सिर्फ़ तर्क और कारण की जीत हो सके। लेकिन अब जानकार यह मानने लगे हैं कि भावनाएँ भी कहीं न कहीं क़ानूनी फैसलों और जजों की सोच पर असर डालती हैं। प्रोफ़ेसर बक्शी ने गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो' का उदाहरण देते हुए हमदर्दी के मतलब को समझाया। उन्होंने मशहूर केशवानंद भारती मामले का ज़िक्र करते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से बताया कि ऊँचे स्तर पर भी हमदर्दी कैसे काम करती है। प्रोफ़ेसर बक्शी के मुताबिक, हमदर्दी का सीधा सा मतलब है ख़ुद को किसी और की जगह रखकर देखना। इसके दो रूप होते हैं: पहला दिमागी (कोग्निटिव) रूप, जहाँ हम अपने विचारों का इस्तेमाल करके दूसरे के नज़रिए से सोचते हैं। दूसरा जज़्बाती (भावनात्मक) रूप, जहाँ हम असल में वही महसूस करते हैं जो सामने वाला झेल रहा है। सबसे मज़बूत हमदर्दी इन दोनों का मिला-जुला रूप होती है। क़ानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए इस हमदर्दी का होना बहुत काम आता है। हर क़ानूनी रिपोर्ट और केस की फ़ाइल के पीछे ऐसे इंसान होते हैं जिनकी ज़िंदगी आर्थिक और मानसिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित होती है। हमदर्दी हमें उनके नज़रिए की इज़्ज़त करना सिखाती है।

क्या सत्य और अहिंसा का मार्ग ही मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है? 
बापू की पूरी ज़िंदगी इसी सच्चाई और अहिंसा की खोज में गुज़र गई। उन्होंने हमेशा यही माना कि धर्म और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं; बिना नैतिकता के धर्म एकदम खोखला है। (Brunners) कलेक्शन की तस्वीरों और चित्रों में भी उनके इसी सादे लेकिन बहुत गहरे जीवन-दर्शन की झलक देखने को मिलती है। उनका मानना था कि भगवान अपनी ही बनाई दुनिया में बसता है, इसलिए ग़रीबों की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। कुल मिलाकर, गांधी जी के धर्म की परिभाषा में ऊँच-नीच, स्वर्ग-नरक का डर या ज़बरदस्ती धर्म बदलने जैसी उन बातों की कोई जगह नहीं है जो हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देती हैं। उनका यह 'आध्यात्मिक मानववाद' और भजनों के ज़रिए करुणा का संदेश आज भी हमारे समाज को जोड़ने का बेहतरीन काम कर रहा है। 

संदर्भ:

https://tinyurl.com/25qxv8fm

https://tinyurl.com/22yzk7qy

https://tinyurl.com/26hy5tmr

https://tinyurl.com/26a5r9g2

https://tinyurl.com/24mjev2f

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