आज जानिए, महिषासुर व माँ दुर्गा के 9 दिवसीय युद्ध से जुड़ी नवरात्रि-विजयादशमी पर्व की कथा

विचार I - धर्म (मिथक/अनुष्ठान)
20-10-2026 08:22 AM
आज जानिए, महिषासुर व माँ दुर्गा के 9 दिवसीय युद्ध से जुड़ी नवरात्रि-विजयादशमी पर्व की कथा

हम अभी बड़े हर्ष और उल्लास के साथ नवरात्रि मना रहे हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि साल के अलग-अलग चरणों में, नवरात्रि के त्योहार चार बार मनाए जाते हैं। हालाँकि, इनमें से शुरुआती शरद ऋतु में आने वाली ‘शरद नवरात्रि’ सबसे महत्वपूर्ण है, जो हिंदू पंचांग के आश्विन मास (मुख्य रूप से सितंबर-अक्टूबर) में होती है। इस उत्सव के दौरान पूजे जाने वाले शक्ति के स्वरूपों में क्रमशः दुर्गा, भद्रकाली, अंबा, अन्नपूर्णा देवी, सर्वमंगला, भैरवी, चंडिका, ललिता, भवानी और मूकंबिका शामिल हैं।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है। कई लोगों के लिए यह धार्मिक चिंतन और उपवास का समय होता है। वहीं अन्य लोगों के लिए, यह नृत्य और उत्सव का समय होता है। गुजरात में मनाई जाने वाली शरद नवरात्रि को पूरे देश में, इसके सबसे जीवंत और भव्य उत्सवों में से एक माना जाता है, जहाँ गरबा नृत्य प्रसिद्ध है।

यह त्योहार अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह आदि शक्ति के सम्मान में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। दरअसल, राक्षस महिषासुर ने अग्नि देव से अमर होने का वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के अनुसार, महिषासुर को किसी भी हथियार से मारा या घायल नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप, वह इतना शक्तिशाली हो गया कि उसने लोगों के मन में आतंक पैदा कर दिया और हर तरफ विनाश फैला दिया। राक्षस महिषासुर के इस आतंक को समाप्त करने के लिए सभी देवता समाधान पाने हेतु भगवान शिव के पास गए। तब भगवान शिव ने अन्य देवताओं की शक्तियों के साथ मिलकर देवी आद्य शक्ति की रचना की। भगवान शिव सहित सभी देवी-देवताओं ने महिषासुर से मुकाबला करने के लिए उन्हें आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और सवारी के रूप में एक सिंह भी प्रदान किया। देवी आद्य शक्ति ने महिषासुर से लगातार नौ दिन और नौ रात तक युद्ध किया। दसवें दिन, उन्होंने महिषासुर का वध कर दिया। इन नौ रातों को ‘नवरात्रि’ के रूप में जाना गया, जबकि दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ कहा गया।

‘रात्रि’ शब्द का अर्थ, ‘आपको गहरा विश्राम या तीन प्रकार के तापों (कष्टों) से राहत दिलाने वाली चीज या तत्व है। जबकि ‘ताप’ का अर्थ, ‘तीन प्रकार की अग्नियाँ या तीन परेशानियाँ’ है। ये तीन प्रकार की परेशानियाँ निम्नलिखित हैं:

1. भौतिक – सांसारिक परेशानियाँ,

2. दैविक – ब्रह्मांडीय शक्तियों या देवताओं के स्तर पर होने वाली परेशानियाँ, और

3. आत्मा की परेशानियाँ।

‘नवरात्रि’ ऐसा गहरा विश्राम प्रदान करती है, जो आपको इन तीनों परेशानियों से मुक्त कर सकता है। इसलिए, यह प्रार्थना और कायाकल्प (ऊर्जावान होने) का समय है। नवरात्रि के दौरान, आपका मन दिव्य चेतना में डूबा रहना चाहिए। एक बच्चे के जन्म में नौ महीने लगते हैं। इसलिए, ये नौ दिन माँ के गर्भ से एक बार फिर बाहर आने और एक नया जन्म लेने जैसे हैं। इन नौ दिनों और रातों के दौरान, व्यक्ति को अंतर्मुखी होना चाहिए और अपने मूल (स्रोत) को याद करना चाहिए। इस समय हमें खुद से “मेरा जन्म कैसे हुआ?”, “मेरा स्रोत क्या है?” जैसे कुछ सवाल भी पूछने चाहिए। इस प्रकार, हमें अपनी चेतना पर विचार करना चाहिए।

नवरात्रि के पहले तीन दिन, तमोगुण या जड़ता को समर्पित हैं। अगले तीन दिन रजोगुण या बेचैनी और सक्रियता को समर्पित हैं, जबकि अंतिम तीन दिन सत्व गुण या पवित्रता और उच्च प्राण को समर्पित हैं। सत्व, रज और तम गुण हम सभी में मौजूद हैं। इसके अलावा, इन सभी गुणों पर विजय पाना, स्वयं पर स्थिर रहना और जीवन का जश्न मनाने वाले अंतिम दिन को ‘विजयादशमी’ या ‘विजय दिवस’ कहा जाता है। वास्तव में, नवरात्रि के प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व है और हर दिन से एक रंग जुड़ा हुआ है।

• पहला दिन पर्वतराज की पुत्री माँ शैलपुत्री को समर्पित है। उन्हें भगवान शिव की पत्नी - माता पार्वती का अवतार भी माना जाता है। प्रतिपदा यानी पहले दिन का रंग पीला है। नवरात्रि में पीले रंग का महत्व यह है कि यह धूप और उत्सव के दिनों की शुरुआत में महसूस होने वाली खुशी की भावना का जश्न मनाता है। लोग माँ शैलपुत्री को चमेली के फूल भी अर्पित करते हैं, क्योंकि यह उनका प्रिय फूल माना जाता है।

• दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जिन्हें दुर्गा का दूसरा अवतार कहा जाता है। कहा जाता है कि यह दुर्गा का वह रूप है, जो आपको मोक्ष या मुक्ति दिला सकता है। इस दिन लोग हरा रंग पहनते हैं, क्योंकि यह एक नई शुरुआत के साथ-साथ विकास का प्रतीक है। लोगों का मानना है कि यदि वे इस दिन हरा रंग पहनें, तो यह उनके जीवन में भी ऊर्जा और प्रगति लेकर आएगा।

• तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित है, जिन्हें जीवन में शांति, समृद्धि और सुकून लाने वाली देवी कहा जाता है। इस दिन का रंग स्लेटी (ग्रे) है। यह सभी बुराइयों को समाप्त करने के दृढ़ संकल्प और हिम्मत का प्रतीक है।

• चौथा दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की रचयिता हैं। उन्हें मुस्कुराने वाली देवी भी माना जाता है। चूँकि नारंगी रंग सबसे खुशनुमा रंगों में से एक है, इसलिए यह इस दिन का रंग है। यह जीवंतता और ज्ञान का प्रतीक है।

• पाँचवा दिन माँ स्कंदमाता को समर्पित है, जो एक माता की शक्ति और कोमलता दोनों को दर्शाती हैं। लोग सफेद रंग पहनकर उनकी पवित्रता और शांति का जश्न मनाते हैं।

• छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। वे प्रसिद्ध ऋषि कात्या के यहाँ जन्मी थीं और अपने साहस के लिए जानी जाती थीं। इस दिन भक्त लाल रंग पहनकर, उनकी सुंदरता और वीरता का जश्न मनाते हैं।

• सातवें दिन, दुर्गा जी के सबसे भयंकर रूप की पूजा की जाती है, जिन्हें कालरात्रि कहा जाता है। दुर्गा के इस रूप को अक्सर गहरे नीले रंग की त्वचा के साथ दर्शाया जाता है। यही कारण है कि नीला इस दिन का रंग है। नीला रंग उनकी उस असीम शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है, जो वास्तव में दिव्य है।

• आठवें दिन, महागौरी जी की उनके बुद्धिमान और शांत स्वभाव के लिए पूजा की जाती है। उन्हें प्रसन्नता की देवी माना जाता है और उनके दिन को समर्पित रंग मयूर हरा (पीकॉक ग्रीन) है। नवरात्रि में इस हरे रंग का महत्व यह है कि यह सामंजस्य और आनंद की भावना का प्रतीक है।

• अंतिम और नौवें दिन, देवी सिद्धिदात्री की कायाकल्प करने वाली और उपचार करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती है। उनके लिए गुलाबी रंग चुना गया है। गुलाबी रंग आशा और आत्म-परिमार्जन की भावना को दर्शाता है।

साल की चार नवरात्रियों में से, शरद ऋतु की नवरात्रि के अलावा, एक अन्य नवरात्रि भी उसी आस्था से मनाई जाती है। नवरात्रि केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। यह ब्रह्मांडीय चक्रों, मौसमी बदलावों और आंतरिक मनोवैज्ञानिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाने वाला एक सावधानीपूर्वक निर्धारित आध्यात्मिक अनुष्ठान है। हिंदू परंपरा में दो मुख्य नवरात्रियों को मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में मनाई जाती है, और शरद नवरात्रि, जो शरद ऋतु में मनाई जाती है। ये सौर वर्ष के दो ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ों पर आती हैं, जब प्रकृति स्वयं एक दृश्य परिवर्तन से गुजरती है।

वसंत ऋतु नवीनीकरण, उद्भव और संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरी ओर, शरद ऋतु परिपक्वता, फसल कटाई और विश्राम की तैयारी का प्रतीक है। मानव मनोविज्ञान भी इन मौसमी बदलावों को उससे कहीं अधिक गहराई से दर्शाता है, जितना अधिकांश लोग समझते हैं। दोनों नवरात्रियाँ ‘संधि काल’ के रूप में जानी जाने वाली अवधि के दौरान आती हैं, जो कि ऋतुओं के बीच का संक्रांति काल होता है। हिंदू विचार में, संक्रांति की इन अवधियों को ऊर्जा के दृष्टिकोण से बहुत संवेदनशील माना जाता है।

ऐसे समय में, शरीर, मन और पर्यावरण असंतुलन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान, उपवास और अनुशासित साधना संतुलन बनाए रखने वाले अभ्यासों के रूप में कार्य करती हैं। अति का जश्न मनाने के बजाय, नवरात्रि संयम, सादगी और संतुलन पर जोर देती है, जो बदलाव के समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण गुण हैं।

जिस प्रकार प्रकृति में बदलाव होते हैं, मनुष्य भी आंतरिक चक्रों से गुजरता है। साल भर हमारे भावनात्मक पैटर्न, प्रेरणा का स्तर और मानसिक स्पष्टता में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। नवरात्रि को दो बार मनाकर, हिंदू परंपरा आत्म-नियमितीकरण के लिए दो संरचित अवसर प्रदान करती है - एक विकास की शुरुआत करने के लिए, और दूसरा उसे सुदृढ़ करने के लिए।

चैत्र नवरात्रि संकल्प लेने और नवीनीकरण को बढ़ावा देती है। जबकि शरद नवरात्रि आत्मनिरीक्षण और खुद को जड़ों से जोड़े रखने (ग्राउंडिंग) के लिए प्रेरित करती है। परिवर्तन के लिए, प्रयास और विश्राम दोनों की आवश्यकता होती है। अतः नवरात्रि, साधक पर अत्यधिक बोझ डाले बिना अनुशासन की केंद्रित अवधि प्रदान करती है।

वसंत और शरद ऋतु वे बिंदु हैं, जहाँ गर्मी और सर्दी के बीच का संतुलन काफी हद तक बदल जाता है। ये बदलाव न केवल पर्यावरण को प्रभावित करते हैं बल्कि पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, भावनात्मक स्थिरता और मानसिक स्पष्टता को भी प्रभावित करते हैं। प्राचीन ऋषियों ने देखा था कि इन चरणों के दौरान अनुशासित आध्यात्मिक अभ्यास से अधिक गहरे परिणाम मिलते हैं। इस प्रकार, दो नवरात्रियों पर जोर देना चुनिंदा परंपरा नहीं, बल्कि गहरे अवलोकन पर आधारित व्यावहारिकता को दर्शाता है।

 

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/nhk2yxfd 

2. https://tinyurl.com/3fdezvfh 

3. https://tinyurl.com/y457tp9t 

4. https://tinyurl.com/2bxmnjkn 

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