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फरवरी 1980 की एक सुबह जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में चिकित्सा जगत ने एक अभूतपूर्व घटना देखी। डॉ. लेवी वॉटकिंस जूनियर ने एक 47 वर्षीय महिला के शरीर में दुनिया का पहला 'इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर' (Implantable Cardioverter Defibrillator ICD) प्रत्यारोपित किया। यह वह दौर था जब विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर संशय में थे। यहाँ तक कि बाहरी डिफिब्रिलेटर के आविष्कारक बर्नार्ड लाउन ने भी इसे "एक अव्यवहारिक समाधान" करार दिया था। लेकिन आज, यही यंत्र दुनिया भर में अचानक होने वाली कार्डियक डेथ (Sudden Cardiac Death) को रोकने का सबसे प्रमुख हथियार बन चुका है।
ICD क्या है और यह हमारे दिल की सुरक्षा कैसे करता है?
इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफिब्रिलेटर (ICD) एक छोटा, बैटरी से चलने वाला उपकरण है जिसे शरीर के अंदर, आमतौर पर बाएं कॉलरबोन के नीचे लगाया जाता है। विकिपीडिया के आंकड़ों के अनुसार, यह मुख्य रूप से उन मरीजों के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें वेंट्रिकुलर फाइब्रिलेशन या वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया जैसी जानलेवा स्थितियों का खतरा होता है। यह उपकरण लगातार हृदय की लय (Rhythm) की निगरानी करता है।

जब भी हृदय की गति एक निर्धारित सीमा से अधिक तेज़ या अनियमित हो जाती है, तो यह उपकरण तुरंत उसे पहचान लेता है। आधुनिक ICD न केवल खतरनाक धड़कन को पहचानते हैं, बल्कि वे 'ओवरड्राइव पेसिंग' या 'एंटी-टैकीकार्डिया पेसिंग' (ATP) के जरिए दिल को सामान्य लय में लाने की कोशिश भी करते हैं। यदि गति फिर भी अनियंत्रित रहती है, तो यह उपकरण एक बिजली का झटका (Shock) भेजता है ताकि हृदय फिर से अपनी सामान्य गति पर लौट सके। इसकी कार्यप्रणाली किसी आपातकालीन कक्ष में डॉक्टर द्वारा दिए जाने वाले बाहरी झटके के समान ही होती है, लेकिन शरीर के अंदर होने के कारण इसे बहुत कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।
चिकित्सा इतिहास में इन उपकरणों का विकास कैसे हुआ?
हृदय को सहारा देने की सुरक्षा करने वाले इन उपकरणों की कहानी लगभग 100 साल पुरानी है। पेसमेकर के विकास की शुरुआत 1928 में हुई थी, लेकिन पहला पूरी तरह से प्रत्यारोपित होने वाला पेसमेकर 1958 में स्वीडन के करोलिंस्का संस्थान में लगाया गया था। इसे रूण एल्मक्विस्ट और सर्जन एके सेनिंग ने विकसित किया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि दुनिया के पहले पेसमेकर प्राप्त करने वाले मरीज, अर्ने लार्सन, अपने जीवनकाल में 26 अलग-अलग पेसमेकर उपकरणों के साथ 86 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।
ICD के विकास का श्रेय डॉ. मिशेल मिरोव्स्की और उनकी टीम को जाता है। 1969 में शुरू हुई उनकी रिसर्च को 11 साल बाद सफलता मिली। एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी (APL) ने इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल होने वाली उच्च-तकनीक और गुणवत्ता नियंत्रण तकनीकों को इस मेडिकल डिवाइस में लागू किया गया। शुरुआती दौर में ये उपकरण इतने बड़े थे कि उन्हें पेट के क्षेत्र में प्रत्यारोपित करना पड़ता था और इसके लिए मरीज की पसलियों को खोलना पड़ता था।
पेसमेकर और ICD के बीच मुख्य अंतर क्या है?
यद्यपि ये दोनों उपकरण दिखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इनका कार्य अलग है। पेसमेकर मुख्य रूप से 'ब्रैडीकार्डिया' यानी धीमी धड़कन के इलाज के लिए होता है। यह तब काम करता है जब हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर सही संकेत नहीं दे पाता। दूसरी ओर, ICD एक अधिक उन्नत प्रणाली है जिसमें पेसमेकर और डिफिब्रिलेटर दोनों के गुण होते हैं। यह धीमी धड़कन को सामान्य करने के साथ-साथ जानलेवा तेज़ धड़कन को रोकने की क्षमता भी रखता है। मे़डट्रॉनिक (Medtronics) के अनुसार, आधुनिक पेसमेकर अब विटामिन के कैप्सूल जितने छोटे (Leadless Pacemakers) भी आने लगे हैं, जिन्हें सीधे हृदय के अंदर लगाया जा सकता है।

ग्लोबल मार्केट और भारत में इन उपकरणों की आपूर्ति कैसे होती है?
इन जीवनरक्षक उपकरणों का निर्माण और वैश्विक आपूर्ति मुख्य रूप से कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मे़डट्रॉनिक (Medtronic), सेंट जूड मेडिकल (अब एबॉट) और बोस्टन साइंटिफिक द्वारा की जाती है। साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ICD एक जटिल प्रणाली है जिसमें पल्स जेनरेटर, लीड्स (तारे) और एक प्रोग्रामर शामिल होता है। इसके जेनरेटर में कंप्यूटर चिप, रैम, प्रोग्रामेबल सॉफ्टवेयर और लिथियम-सिल्वर वैनेडियम बैटरी होती है।
भारत जैसे देशों में, जहाँ हृदय रोगों का बोझ बहुत अधिक है, इन उन्नत चिकित्सा तकनीकों के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पीएमसी (PMC) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत इन उपकरणों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाता है। उन्नत मेडिकल ग्रेड बैटरी और माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण की स्थानीय सीमाओं के कारण, भारत के मरीजों को इन वैश्विक कंपनियों की तकनीक पर ही भरोसा करना पड़ता है। हालांकि, तकनीकी प्रगति के साथ इन उपकरणों की बैटरी लाइफ अब 10 साल से अधिक होने लगी है, जिससे बार-बार सर्जरी की आवश्यकता कम हुई है।
इन उपकरणों के साथ जीवन जीने की क्या चुनौतियाँ हैं?
एक बार ICD या पेसमेकर लग जाने के बाद मरीज एक सामान्य और सक्रिय जीवन जी सकता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी ज़रूरी होती हैं। मरीजों को तेज़ चुंबकीय क्षेत्र, एमआरआई (MRI) मशीनों और कुछ विशेष औद्योगिक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। हालांकि, मे़डट्रॉनिक जैसी कंपनियों ने अब 'MRI-Conditional' उपकरण पेश किए हैं, जिन्हें विशेष सेटिंग्स के साथ एमआरआई स्कैन के दौरान सुरक्षित रखा जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा प्रभाव देखा गया है। शोध बताते हैं कि लगभग 13% से 38% मरीजों में अचानक लगने वाले झटके के डर से चिंता (Anxiety) और अवसाद के लक्षण देखे जा सकते हैं। इसीलिए, आधुनिक उपकरणों में अब ऐसी तकनीकें शामिल की जा रही हैं जो 'इनएप्रोप्रिएट शॉक' (गलत समय पर लगने वाले झटके) को कम कर सकें।

क्या है इन उपकरणों का भविष्य?
चिकित्सा जगत अब 'लीडलेस' (बिना तारों वाले) उपकरणों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की ओर बढ़ रहा है। मे़डट्रॉनिक के अनुसार, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम अब डॉक्टरों को इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे मरीज के दिल की जानकारी देने में सक्षम हैं। भविष्य में, एआई इन उपकरणों के डेटा का विश्लेषण कर धड़कन बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को चेतावनी दे सकेगा। भारत के लिए चुनौती इन महँगी तकनीकों को आम जनता के लिए सुलभ और किफायती बनाने की है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/h925vt8
2. https://tinyurl.com/24nwczyp
3. https://tinyurl.com/2263e94d
4. https://tinyurl.com/22cvptb5
5. https://tinyurl.com/ojwh4vb
6. https://tinyurl.com/27mspxyw
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