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विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार,2018 में भारत में कैंसर के लगभग 1.16 मिलियन मामले थे। इसमें यह भी कहा गया था कि 10 में से एक भारतीय के जीवनकाल में कैंसर का विकास होगा तथा 15 में से एक की बीमारी के कारण मृत्यु हो जाएगी। इस रिपोर्ट में भारत में, छह सबसे आम प्रकार के कैंसर: स्तन कैंसर (162,500 मामले), मुंह का कैंसर (120,000 मामले), सर्वाइकल (Cervical) कैंसर (97,000 मामले), फेफड़े का कैंसर (68,000 मामले), पेट का कैंसर (57,000 मामले), और कोलोरेक्टल (Colorectal) कैंसर (57,000 मामले) थे। कुल मिलाकर, ये सभी नए कैंसर मामलों का 49% हिस्सा हैं।भारत में कैंसर के पैटर्न में पुरुषों में तंबाकू से संबंधित सिर और गर्दन के कैंसर, विशेष रूप से मुंह के कैंसर का उच्च बोझ है, जबकि महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का उच्च बोझ है। ये दोनों प्रकार के कैंसर निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी कि अगले 20 वर्षों में वैश्विक कैंसर की दर 60% तक बढ़ सकती है जब तक कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कैंसर की देखभाल में तेजी नहीं आई।
कैंसर के बढ़ते मामलों में इक्विटी गैप मुख्य भूमिका निभाता है। जहां निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इक्विटी गैप अधिक स्पष्ट है, वहीं अच्छी तरह से संसाधन युक्त देश में भी यह मौजूद है।दुनिया भर में, महिलाओं और लड़कियों को कुप्रथा, रूढ़िवादिता और अपेक्षित लिंग भूमिकाओं के परिणामस्वरूप भेदभाव का सामना करना पड़ता है तथा यह कैंसर देखभाल तक उनकी पहुंच को और भी सीमित करता है।जातिवाद का किसी व्यक्ति की कैंसर देखभाल तक पहुँचने की क्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है और अल्पसंख्यक आबादी को अक्सर अपने देशों की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।गरीबी गंभीर रूप से गुणवत्तापूर्ण कैंसर देखभाल तक पहुंच को सीमित करती है। उच्च और निम्न-आय वाले देशों में समान रूप से, निम्न सामाजिक आर्थिक स्थिति का अर्थ है कम पहुंच। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में रोकथाम, स्क्रीनिंग (Screening) और उपचार सेवाओं की कमी का मतलब है,आवश्यक संसाधनों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी की यात्रा करना। किसी व्यक्ति की उम्र कितनी है, इस बात के आधार पर उसको मिलने वाली कैंसर देखभाल की गुणवत्ता तय नहीं करनी चाहिए। फिर भी कई लोगों के लिए यह वास्तविकता है।कैंसर किसी भी उम्र में विकसित हो सकता है, लेकिन इसके होने का खतरा उम्र के साथ नाटकीय रूप से बढ़ जाता है।एक विशेष प्रकार के स्तन कैंसर वाली वृद्ध महिलाओं का उच्च अनुपात अपने युवा समकक्षों की तुलना में कम कीमोथेरेपी (Chemotherapy) प्राप्त करता है।
कोरोना महामारी ने देश के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है, जिसमें कैंसर देखभाल वितरण प्रणाली भी एक है, खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश कैंसर रोगियों को आम तौर पर उचित कैंसर उपचार प्राप्त करने के लिए बड़े शहरों में जाने की आवश्यकता होती है। किंतु संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए किए गए प्रयासों के चलते कैंसर देखभाल वितरण सेवाओं में अनेकों बाधाएं उत्पन्न हुईं,जिसके कारण निदान या उपचार की शुरुआत और उपचार में रुकावट या पुनर्निर्धारण में देरी हुई। इस महामारी ने कैंसर देखभाल में मौजूद असमानता को और भी बढ़ा दिया है। हम स्वास्थ्य समानता तब प्राप्त करेंगे जब प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक स्थिति या अन्य सामाजिक रूप से निर्धारित परिस्थितियों द्वारा निर्मित बाधाओं या सीमाओं के बिना अपनी पूर्ण स्वास्थ्य क्षमता तक पहुंचने का अवसर मिलेगा।कैंसर की रोकथाम के बारे में जनता को शिक्षित करके, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों को कौशल और ज्ञान से युक्त करके (यह ध्यान में रखते हुए कि असमानता कैंसर की देखभाल को कैसे प्रभावित करती है),समुदायों में वितरित प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत करके,नीति और कार्यक्रमों के माध्यम से कुछ सामाजिक और आर्थिक कारकों को हल करके,संसाधनों में वृद्धि करके,देश-विशिष्ट कैंसर की रोकथाम और नियंत्रण योजनाओं को लागू करके सामूहिक रूप से,कैंसर देखभाल में मौजूद असमानता को कम किया जा सकता हैं।
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