रामपुर की आबिदा बेगम ने पहली गांधी टोपी सिल कर, रखी औपनिवेश भारत में एकता की कड़ी बुनियाद

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
02-10-2026 09:10 AM
रामपुर की आबिदा बेगम ने पहली गांधी टोपी सिल कर, रखी औपनिवेश भारत में एकता की कड़ी बुनियाद

भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ हथियारों या बड़े राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके ताने-बाने में हमारे पहनावे, प्रतीकों और ज़मीनी आंदोलनों का बहुत बड़ा हाथ था। उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक रामपुर रियासत हो या फिर दक्षिण भारत का मदुरै—हर शहर ने आज़ादी के आंदोलन में अपना एक नया रंग भरा। इसी तरह, पहले विश्व युद्ध के बाद जब ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू हुआ, तो गांधी जी और अली बंधुओं के राजनीतिक गठजोड़ ने देश की आज़ादी की पूरी लड़ाई को एक नई दिशा दे दी।

रामपुर में कैसे हुआ था विश्व-प्रसिद्ध गांधी टोपी का जन्म? 
ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि बापू की पहचान बन चुकी गांधी टोपी का उद्गम गुजरात के साबरमती या महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ होगा। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस टोपी की असली शुरुआत रामपुर रियासत से हुई थी। रामपुर के इतिहास पर किताबें लिखने वाले 75 वर्षीय वकील शौकत अली बताते हैं कि महात्मा गांधी ने 1920 में रामपुर का दौरा किया था और यहीं उन्होंने पहली बार यह टोपी पहनी थी। दरअसल, 1920 में गांधी जी मौलाना मोहम्मद अली जौहर की बेटी के निकाह में शरीक होने मुरादाबाद आए थे, जो उस दौर में रामपुर का ही हिस्सा था। शादी के बाद गांधी जी ने रामपुर के नवाब सैयद हामिद अली ख़ान बहादुर से मिलने का फ़ैसला किया, जिन्होंने 1889 से 1930 तक वहाँ हुकूमत की थी। उस समय रियासत का यह दस्तूर था कि नवाब के दरबार में कोई नंगे सिर नहीं जा सकता था, और गांधी जी के पास कोई टोपी नहीं थी। साथियों ने बाज़ार भर में ढूँढा, लेकिन गांधी जी के सिर के नाप की कोई टोपी नहीं मिली। ऐसे में मोहम्मद अली जौहर की वालिदा आबिदा बेगम आगे आईं। उन्होंने घर में ही काते गए खुरदरे सूती कपड़े यानी 'गारा' से अपने हाथों से एक टोपी सिलकर तैयार कर दी। बापू को वह सादी टोपी इतनी पसंद आई कि पूरे रामपुर प्रवास के दौरान उन्होंने उसे सिर से उतारा ही नहीं। आगे चलकर यही सादी टोपी पूरे देश में 'गांधी टोपी' के नाम से आज़ादी का सबसे लोकप्रिय प्रतीक बन गई।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद ख़िलाफ़त आंदोलन में गांधी जी और अली बंधुओं का गठबंधन कैसे बना? 
ख़िलाफ़त आंदोलन की जड़ें पहले विश्व युद्ध की उथल-पुथल से जुड़ी थीं। जब 1914 में तुर्की (Turkey) ने मित्र देशों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान किया, तो भारत के मुसलमानों में गहरी चिंता फैल गई। 11 नवंबर को जर्मनी (Germany) के हथियार डालने और 31 अक्टूबर को तुर्की (Turkey) के झुकने के बाद ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) पूरी तरह बिखर गया। तुर्की (Turkey) को मुद्रोस (Mudros) में युद्धविराम` समझौते पर दस्तख़त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। एंटेंट पावर्स (Entente powers) से हारने के बाद सुल्तान वाहिदेद्दीन मेहमेद षष्ठम (Sultan Vahideddin Mehmed VI) ने ब्रिटेन (Britain) की शर्तों पर चलना शुरू कर दिया। इधर दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से लौटने के बाद महात्मा गांधी अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ आवाज़ उठाने वाले अली बंधुओं के हौसले से बहुत प्रभावित हुए और 1915 में मोहम्मद अली से मिले। गांधी जी ने इस मुलाक़ात को याद करते हुए लिखा था कि यह "पहली नज़र का प्यार" जैसा था। जाने-माने इतिहासकार बी.आर. नंदा लिखते हैं कि दोनों के तौर-तरीक़ों में भले ही बहुत फ़र्क़ था, लेकिन जेल से अली बंधुओं की रिहाई के लिए गांधी जी की कोशिशों ने उनके दिलों को जोड़ दिया। लेखक अफ़ज़ल इकबाल के अनुसार, अहिंसा को लेकर अपने अलग नज़रिए के बावजूद मोहम्मद अली बापू के सबसे भरोसेमंद साथी बन गए। मोहम्मद अली का गांधी जी पर इतना पक्का यक़ीन था कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया था: “पैगंबर के बाद... मैं गांधी के आदेशों पर चलना अपना सबसे बड़ा फ़र्ज़ मानता हूँ।”

असहयोग आंदोलन के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता ने ब्रिटिश हुकूमत को कैसे चुनौती दी? 
लखनऊ में ख़िलाफ़त सम्मेलन की सदारत करते हुए मोहम्मद अली ने बापू की मौजूदगी में भरे मंच से कहा था: "मैं आज यह ऐलान करता हूँ कि हिंदुस्तानी फ़ौज महात्मा गांधी की फ़ौज है, हिंदुस्तानी पुलिस महात्मा गांधी की पुलिस है और हर इंसान गांधी के साथ खड़ा है..."। गांधी जी ने अली बंधुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरे मुल्क का दौरा किया और अलीगढ़ कॉलेज के नौजवानों से सरकारी संस्थानों का बहिष्कार करने की अपील की। बापू का 'स्वराज' का विचार अली बंधुओं के दिल में पूरी तरह उतर चुका था। अमृतसर में कांग्रेस ने ख़िलाफ़त के मसले पर गांधी जी की अगुआई को यह कहते हुए मंज़ूर किया कि जब देश का एक हिस्सा भारी तकलीफ़ में हो, तो दूसरा हिस्सा चुपचाप अलग नहीं बैठ सकता। जुलाई 1920 में सिंध में हुए ख़िलाफ़त सम्मेलन में गांधी जी ने 23 करोड़ हिंदुओं से 7 करोड़ मुसलमान भाइयों का साथ देने की अपील की, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता की एक मज़बूत बुनियाद रख दी। फिर सितंबर 1920 के कलकत्ता के विशेष कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग के फ़ैसले पर दोनों समुदायों ने अपनी मुहर लगाई। इसके बाद अली बंधुओं ने और भी तीखे भाषण देने शुरू किए, और अक्टूबर 1920 में लखनऊ में मोहम्मद अली ने अंग्रेज़ी अख़बारों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया, जहाँ उन्हें अपनी सभाओं के इश्तिहार छपवाने के लिए भी 150 से 200 पाउंड चुकाने पड़ते थे। हालांकि, 1924 के कोहाट दंगों और 1928 की नेहरू रिपोर्ट के बाद इस रिश्ते में कड़वाहट आ गई और 21 दिसंबर 1928 को अली बंधुओं ने ख़िलाफ़त सम्मेलन में नेहरू रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया।

मदुरै की उस भावुक घटना ने गांधी जी को आजीवन खादी का महात्मा कैसे बनाया? 
कपड़ों के ज़रिए जनता के साथ जुड़ने का गांधी जी का यह सफ़र सिर्फ़ टोपी तक ही नहीं रुका। दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में वकालत करते समय बापू थ्री-पीस सूट पहना करते थे। 1915 में जब वे अपने वतन लौटे, तो उन्होंने पारंपरिक गुजराती वेशभूषा अपना ली। लेकिन 20 सितंबर 1921 को अपनी दूसरी मदुरै यात्रा के दौरान गांधी जी वेस्ट मासी स्ट्रीट में ठहरे हुए थे। वहाँ उन्होंने जब खेत-खलिहानों में दिहाड़ी मज़दूरों को तन पर बिना कमीज़ के पसीना बहाते देखा, तो इस मंज़र ने उनके दिल को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वे सोचने लगे कि जिस मुल्क के करोड़ों ग़रीबों के पास तन ढकने को कपड़ा तक नहीं है, वहाँ वे ख़ुद इतने कपड़े कैसे पहन सकते हैं? उसी रात, यानी 21 सितंबर को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक हमेशा के लिए छोड़ दी और महज़ चार मीटर लंबी खादी की धोती लपेट ली। अगली सुबह 22 सितंबर को जब वे कामराज स्ट्रीट (जिसे आज 'गांधी पोट्टल' कहा जाता है) में लोगों के सामने पहुँचे, तो सिर्फ़ एक सादी खादी की वेष्टि में अपने नेता को देखकर सब हैरान रह गए। वेस्ट मासी स्ट्रीट का वह मकान जहाँ बापू रुके थे, आज एक खादी केंद्र बन चुका है और वहाँ लगी पत्थर की पट्टिका इस ऐतिहासिक फ़ैसले की गवाही देती है।

चरखा और खादी कैसे बने भारत की आत्मनिर्भरता के सबसे बड़े हथियार? 
स्वदेशी की लड़ाई में चरखा महज़ सूत कातने का औज़ार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वावलंबन का सबसे बड़ा हथियार बन गया था। साबरमती आश्रम का यह पक्का नियम था कि सभी साथी सिर्फ़ हाथ से कते सूत और बुने हुए कपड़े ही पहनेंगे। गंगाबेन मजूमदार ने बड़ौदा रियासत के विजापुर से गांधी जी के लिए पहला चरखा खोजकर निकाला, जिसके बाद आश्रम में बड़े पैमाने पर खादी तैयार होने लगी। 1918 में बापू ने गाँवों में रहने वाले ग़रीबों को सहारा देने के लिए खादी की मुहिम शुरू की थी। धीरे-धीरे यह सिर्फ़ रोज़गार का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और आज़ादी की अलख जगाने का सबसे बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक प्रतीक बन गया। आज भी निफ्ट बेंगलुरु जैसे संस्थान कर्नाटक राज्य खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के साथ मिलकर 400 से ज़्यादा नए डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं, ताकि खादी की इस सुनहरी विरासत को नई पीढ़ी की पसंद के मुताबिक़ आगे बढ़ाया जा सके।

संदर्भ:

https://tinyurl.com/2bfokkz8

https://tinyurl.com/27kkw9c7

https://tinyurl.com/2aoh8fej

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