मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का

मिट्टी के बर्तन से काँच व आभूषण तक
27-07-2026 09:24 AM
मणिपुर के लोंगपी काली मिट्टी बर्तन हैं एक उदाहरण, आधुनिक युग में पारंपरिक शिल्प के सम्मान का

हम जानते ही हैं कि, हमारा भारत देश शिल्प कला में दुनिया में अग्रसर है। क्या आप जानते हैं कि, मणिपुर के नुंगबी खुल्लन गांव के तांगखुल नागा लोग, कई सदियों से हाथ से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। माना जाता है कि,  ये ‘लोंगपी मिट्टी बर्तन’, जिन्हें नुंगबी मिट्टी के बर्तन के नाम से भी जाना जाता है, नवपाषाण काल (10,000 ईसा पूर्व) से ही चलन में है। उखरुल जिले के नुंगबी गांव में 400 घर हैं, और लगभग 200 कारीगर आज भी इस शिल्प का अभ्यास कर रहे हैं। मुख्य कुम्हार और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता - माचिहान सासा, तांगखुल जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, और उनके काम ने इधर की मिट्टी के बर्तनों को वैश्विक पहचान दिलाई है।

पत्थर-मिट्टी के साधारण बर्तन बनाने के लिए, अगर मिट्टी को पत्थर के साथ मिलाया जाए, तो आग में गर्म करने पर वह फूट जाएगा। परंतु, तांगखुल लोगों ने इस शिल्प में महारत हासिल की है, और लोंगपी बर्तनों का भंडारण के साथ-साथ, उच्च तापमान पर खाना पकाने के लिए भी सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।

हाथ से आकार दिए गए इन बर्तनों को पॉलिश किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है, और फिर अलाव में जलाया जाता है। इससे उनका रंग काला या भूरा, और धातु जैसा दिखने लगता है। परंपरागत रूप से, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों का उपयोग स्थानीय स्तर पर, मैतेई, माओ नागा, कोम, पाओमी, जैसे कुछ अन्य समुदायों द्वारा भी किया जाता था। अब मणिपुर के बाहर भी इनकी अच्छी मांग है, क्योंकि लोंगपी बर्तनों में पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट माना जाता है। नुंगबी में, उनका उपयोग चावल से बीयर बनाने, मसालों तथा पानी के भंडारण, और खाना पकाने के लिए किया जाता है।

पहले, यह शिल्प दो गांवों – नुंगबी और लोंगपी काजुई में प्रचलित था, परंतु आज, नुंगबी खुल्लन एकमात्र कुम्हार गांव बना है। यहां पुरुष और महिलाएं दोनों मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लेकिन पुरुष कारीगरों की संख्या महिला कुम्हारों से अधिक है। लोंगपी शिल्प को मूल रूप से ‘लोरी हैमलेई’ कहा जाता था, जिसका अर्थ शाही मिट्टी के बर्तन था। तब, केवल अमीर लोग ही इसे खरीद सकते थे। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, और निर्माण काम कई महीनों तक चलता है। क्योंकि, कारीगर स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार काम करते हैं।

https://sceh.net/ 

मिट्टी को तीन दिनों तक सुखाने के बाद, ओखली और मूसल का उपयोग करके इसका महीन पाउडर बनाया जाता है, और फिर बांस की छलनी से इसे छान लिया जाता है। सरपेंटाइन या जहरमोहरा पत्थर, इन बर्तनों में प्रयुक्त होने वाला एक अन्य प्रमुख घटक है, जिसे स्थानीय रूप से 'लेशोनलुंग' कहा जाता है। मैग्नीशियम से भरपूर होने के कारण, इसका रंग नीला, हरा या काला होता है। इस पत्थर को काफुंग्रिम पहाड़ी से निकाला जाता है, जो इस गांव से लगभग 30 मिनट की पैदल दूरी पर है। कुम्हार इसे शुष्क मौसम में एकत्र करते हैं, क्योंकि तब इसे ले जाना और साफ करना आसान होता है। फिर, इस पत्थर का भी पाउडर बनाया जाता है।

इसके बाद, एक निश्चित अनुपात में छनी हुई मिट्टी का पाउडर, पत्थर का पाउडर, और पानी मिलाया जाता है, ताकि उचित बर्तन बन सकें। फिर, मिश्रण को नरम और लचीला होने तक गूंधा जाता है। बर्तन का मूल मॉडल प्राप्त करने के लिए सांचे, स्लैब और अन्य विभिन्न उपकरणों का उपयोग करके, इस सामग्री को उसमें लगाया जाता है।

अगले दिन, इसे बांस के चप्पू और धागे का उपयोग करके हाथों से आकार दिया जाता है, जबकि बांस की छड़ी की मदद से ही, इनका समतलन भी किया जाता है। अंत में, वांछित आकार प्राप्त होने तक इसे सुधारा जाता है, जिसके बाद बाहरी सतह को बांस की छड़ी से खुरच कर चिकना किया जाता है। बर्तनों को दो से तीन दिनों तक सुखाया जाता है। बाद में बर्तनों को चमकाने के लिए, चिकने ठोस पत्थरों या जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता है। इसके बाद, उन्हें फिर से पॉलिश किया जाता है। पॉलिशिंग जितनी अच्छी होगी, उत्पाद उतना ही चमकदार और चिकना होगा। अंत में, बर्तनों को पांच से सात घंटों तक 1200 डिग्री सेल्सियस पर आग में पकाया जाता है।

आग से निकालने के बाद, जब बर्तन गर्म होते हैं, तभी उन्हें माची चीज़ (चिरोना पेड़) की ताजी पत्तियों से साफ और पॉलिश किया जाता है। इस प्रकार, पत्तियों से चमकाने के दौरान बर्तन का रंग, काला या भूरा निर्धारित होता है। यह अंतिम चरण है, जिसके बाद बर्तन उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं।

अधिकांश अन्य मिट्टी के बर्तनों के विपरीत, लोंगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया काफी श्रम-गहन है, और पूरी तरह से हाथों से की जाती है। साथ ही, इसका काला रंग भी प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इसमें कोई रसायन या पेंट की भूमिका नहीं होती। मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में किसी भी रसायन, मशीन या पहियों का उपयोग नहीं किया जाता है। कुछ बर्तन निर्माण कार्यशालाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि पूरी प्रक्रिया हस्तनिर्मित है। लोंगपी उत्पाद किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, और उत्पाद पूरी तरह से अपघटनीय हैं।

2007 में, दिल्ली में लोंगपी शिल्पकार - मैथ्यू सासा द्वारा शुरू की गई ‘मैथ्यू सासा क्राफ्ट’, और सितंबर 2015 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा शुरू की गई यूएसटीटीएडी जैसी पहलें, इस शिल्प को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू सासा, जिन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने और इस शिल्प को लोकप्रिय बनाने के लिए मैथ्यू सासा क्राफ्ट की स्थापना की, माचिहान सासा के पुत्र हैं। मैथ्यू सासा की पहल, राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी और वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी ने, पूरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोंगपी मिट्टी के बर्तनों की लोकप्रियता और बिक्री को बढ़ावा दिया है।

संदर्भ

1. https://tinyurl.com/3jjx3e34 

2. https://tinyurl.com/c3sa9zed 

3. https://tinyurl.com/m5v7x4p6 

4. https://tinyurl.com/2v6c7njn 

5. https://tinyurl.com/2htx3nev 

6. https://tinyurl.com/panmpw5k 

7. https://tinyurl.com/4dz4k5c3 

.